Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar – 6-11-26

सलोकु मः ३ ॥
वाहु वाहु बाणी निरंकार है तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥ वाहु वाहु अगम अथाहु है वाहु वाहु सचा सोइ ॥ वाहु वाहु वेपरवाहु है वाहु वाहु करे सु होइ ॥ वाहु वाहु अम्रित नामु है गुरमुखि पावै कोइ ॥ वाहु वाहु करमी पाईऐ आपि दइआ करि देइ ॥ नानक वाहु वाहु गुरमुखि पाईऐ अनदिनु नामु लएइ ॥१॥ मः ३ ॥ बिनु सतिगुर सेवे साति न आवई दूजी नाही जाइ ॥ जे बहुतेरा लोचीऐ विणु करमै न पाइआ जाइ ॥ जिन्हा अंतरि लोभ विकारु है दूजै भाइ खुआइ ॥ जमणु मरणु न चुकई हउमै विचि दुखु पाइ ॥ जिन्हा सतिगुर सिउ चितु लाइआ सु खाली कोई नाहि ॥ तिन जम की तलब न होवई ना ओइ दुख सहाहि ॥ नानक गुरमुखि उबरे सचै सबदि समाहि ॥२॥ पउड़ी ॥ ढाढी तिस नो आखीऐ जि खसमै धरे पिआरु ॥ दरि खड़ा सेवा करे गुर सबदी वीचारु ॥ ढाढी दरु घरु पाइसी सचु रखै उर धारि ॥ ढाढी का महलु अगला हरि कै नाइ पिआरि ॥ ढाढी की सेवा चाकरी हरि जपि हरि निसतारि ॥१८॥ {पन्ना 515}

अर्थ: जो प्रभू आकार रहित है; जिसके बराबर का और कोई नहीं है; जो अपहुँच है, जिसकी थाह नहीं पाई जा सकती, जिसको किसी की मुथाजी नहीं है, जिसका किया हुआ ही सब कुछ हो रहा है, उसकी सिफत सालाह उसी का रूप है। उसका नाम जीवों को आत्मि्क जीवन देने वाला है, पर उसकी प्राप्ति किसी गुरमुख को ही होती है। सिफत सालाह की दाति सौभाग्य से ही मिलती है, जिसको मेहर करके प्रभू स्वयं देता है, हे नानक! जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है, उसको सिफत सालाह की दाति मिलती है, वह हर समय प्रभू का नाम जपता है।1।

सतिगुरू की बताई सेवा किए बिना शांति नहीं आती और (सतिगुरू के बिना) और कोई जगह नहीं (जहाँ ये मिल सके) चाहे कितनी ही चाहत करें, मेहर के बिना प्रभू की प्राप्ति नहीं हो सकती। जिन मनुष्यों के हृदय में लोभ का अवगुण है, वे माया के प्यार में भूले हुए है, उनका पैदा होना मरना खत्म नहीं होता और वे अहंकार में कलेश उठाते हैं। जिन मनुष्यों ने अपने सतिगुरू से चिक्त जोड़ा है उनमें से (प्रभू के मिलाप से) वंचित कोई नहीं रहा, ना तो उन्हें जम का बुलावा आता है ना ही वे दुख सहते हैं (भाव, उन्हें मौत का सहम नहीं छू सकता)।

हे नानक! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हुए हैं, वे (दुखों से) बच गए हैं और सच्चे शबद में लीन रहते हैं।2।

जो मनुष्य अपने मालिक प्रभू के साथ प्यार डालता है, वही प्रभू का ढाढी कहलवा सकता है (भाव, प्रभू की सिफत सालाह वही बंदा कर सकता है), वह मनुष्य प्रभू की हजूरी में टिक के उसका सिमरन करता है और गुरू के शबद के द्वारा उसके गुणों की विचार करता है। ज्यों-ज्यों वह प्रभू को अपने हृदय में बसाता है, वह प्रभू के चरणों में जुड़ता है (उसे प्रभू की हजूरी प्राप्त होती है), प्रभू के नाम में प्यार करने से उसके मन की अवस्था बहुत ऊँची हो जाती है, बस, वह ढाढी यही सेवा करता है, यही चाकरी करता है कि वह प्रभू का नाम जपता है, और प्रभू उस को (संसार समुंद्र से) पार लंघा लेता है।18।

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