Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar – 14-7-26

वडहंस की वार महला ४
ललां बहलीमा की धुनि गावणी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सलोक मः ३ ॥

सबदि रते वड हंस है सचु नामु उरि धारि ॥ सचु संग्रहहि सद सचि रहहि सचै नामि पिआरि ॥ सदा निरमल मैलु न लगई नदरि कीती करतारि ॥ नानक हउ तिन कै बलिहारणै जो अनदिनु जपहि मुरारि ॥१॥ मः ३ ॥ मै जानिआ वड हंसु है ता मै कीआ संगु ॥ जे जाणा बगु बपुड़ा त जनमि न देदी अंगु ॥२॥ मः ३ ॥ हंसा वेखि तरंदिआ बगां भि आया चाउ ॥ डुबि मुए बग बपुड़े सिरु तलि उपरि पाउ ॥३॥ पउड़ी ॥ तू आपे ही आपि आपि है आपि कारणु कीआ ॥ तू आपे आपि निरंकारु है को अवरु न बीआ ॥ तू करण कारण समरथु है तू करहि सु थीआ ॥ तू अणमंगिआ दानु देवणा सभनाहा जीआ ॥ सभि आखहु सतिगुरु वाहु वाहु जिनि दानु हरि नामु मुखि दीआ ॥१॥

सतिगुरु जी ने आज्ञा की है कि उक्त वार की सुर में गुरु रामदास जी की ये वडहंस की वार गायन करनी है।

अर्थ: जो मनुष्य सच्चे नाम को हृदय में परो के सतिगुरु के शब्द में रंगे हुए हैं, वे बड़े विवेकी (संत) हैं; वे सच्चा नाम (रूपी धन) एकत्र करते हैं, और सच्चे नाम में प्यार के कारण सच में ही लीन रहते हैं; कर्तार ने उन पर मेहर की नजर की है; (इसलिए) वे सदा पवित्र हैं उनको (विकारों की) मैल नहीं लगती। हे नानक! (कह:) जो मनुष्य हर वक्त प्रभु को स्मरण करते हैं, मैं उनके सदके हूँ।1। मैंने समझा था कि ये कोई बड़ा संत है, इस वास्ते मैंने इससे साथ किया था; अगर मुझे पता होता कि ये बेचारा पाखण्डी मनुष्य है तो मैं शुरू से ही इसके पास ना बैठती।2। हंसों को तैरता देख के बगुलों को भी शौक पैदा हो गया (और वे भी हंस की नकल करके तैरने का प्रदर्शन करने लगे, पर हुआ क्या) बगुले बेचारे सिर के बल उलटे हो के डूब के मर गए।3। हे प्रभु! संसार का आरम्भ तूने स्वयं किया, (क्योंकि इससे पहले भी) तू खुद ही है, तू स्वयं ही है; तेरा कोई खास स्वरूप नहीं है (जो मैं बयान कर सकूँ), तेरे जैसा कोई दूसरा नहीं है। सृष्टि की उत्पक्ति करने में तू ही समर्थ है, जो कुछ तू करता है वही होता है; तू सारे जीवों को (उनके) मांगे बिना ही सब दातें दे रहा है।

(हे भाई!) सभी कहो- सतिगुरु (भी) धन्य है जिसने (ऐसे) प्रभु की नाम-रूपी दात (हमारे) मुँह में डाली है (भाव, हमें नाम की दाति बख्शी है)।1।

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