सलोक ॥ दइआ करणं दुख हरणं उचरणं नाम कीरतनह ॥ दइआल पुरख भगवानह नानक लिपत न माइआ ॥१॥ भाहि बलंदड़ी बुझि गई रखंदड़ो प्रभु आपि ॥ जिनि उपाई मेदनी नानक सो प्रभु जापि ॥२॥पउड़ी ॥ जा प्रभ भए दइआल न बिआपै माइआ ॥ कोटि अघा गए नास हरि इकु धिआइआ ॥ निरमल भए सरीर जन धूरी नाइआ ॥ मन तन भए संतोख पूरन प्रभु पाइआ ॥ तरे कुट्मब संगि लोग कुल सबाइआ ॥१८॥
अर्थ: हे नानक! अगर मनुष्य दयालु सर्व-व्यापक भगवान के नाम की वडिआई करे तो प्रभू मेहर करता है, उसके दुखों का नाश करता है और वह मनुष्य माया के मोह में नहीं फसता।1।
हे नानक! जिस प्रभू ने सारी दुनिया रची है उसका सिमरन कर, (सिमरन करने से) वह प्रभू खुद जीव का रखवाला बनता है और उसके अंदर जलती हुई (तृष्णा की) आग बुझ जाती है।2।
अर्थ: जब (जीव पर) प्रभू जी मेहरवान हों तो माया जोर नहीं डाल सकती। एक प्रभू को सिमरने से करोड़ों ही पाप नाश हो जाते हैं, सिमरन करने वाले बँदों की चरण-धूड़ में नहाने से शरीर पवित्र हो जाते हैं, (संतों की संगति में) पूर्ण प्रभू मिल जाता है और मन व तन दोनों को संतोष प्राप्त होता है। ऐसे मनुष्यों की संगति में उनके परिवार के लोग और सारी ही कुलों का उद्धार हो जाता है।18।



