Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar – 31-5-25

सूही महला ४ ॥
जिथै हरि आराधीऐ तिथै हरि मितु सहाई ॥ गुर किरपा ते हरि मनि वसै होरतु बिधि लइआ न जाई ॥१॥ हरि धनु संचीऐ भाई ॥ जि हलति पलति हरि होइ सखाई ॥१॥ रहाउ ॥ सतसंगती संगि हरि धनु खटीऐ होर थै होरतु उपाइ हरि धनु कितै न पाई ॥ हरि रतनै का वापारीआ हरि रतन धनु विहाझे कचै के वापारीए वाकि हरि धनु लइआ न जाई ॥२॥ हरि धनु रतनु जवेहरु माणकु हरि धनै नालि अम्रित वेलै वतै हरि भगती हरि लिव लाई ॥ हरि धनु अम्रित वेलै वतै का बीजिआ भगत खाइ खरचि रहे निखुटै नाही ॥ हलति पलति हरि धनै की भगता कउ मिली वडिआई ॥३॥ हरि धनु निरभउ सदा सदा असथिरु है साचा इहु हरि धनु अगनी तसकरै पाणीऐ जमदूतै किसै का गवाइआ न जाई ॥ हरि धन कउ उचका नेड़ि न आवई जमु जागाती डंडु न लगाई ॥४॥ साकती पाप करि कै बिखिआ धनु संचिआ तिना इक विख नालि न जाई ॥ हलतै विचि साकत दुहेले भए हथहु छुड़कि गइआ अगै पलति साकतु हरि दरगह ढोई न पाई ॥५॥ इसु हरि धन का साहु हरि आपि है संतहु जिस नो देइ सु हरि धनु लदि चलाई ॥ इसु हरि धनै का तोटा कदे न आवई जन नानक कउ गुरि सोझी पाई ॥६॥३॥१०॥ {पन्ना 733-734}

अर्थ: हे भाई! जो हरी इस लोक में और परलोक में मित्र बनता है, उसका नाम-धन इकट्ठा करना चाहिए।1। रहाउ।

हे भाई! जिस भी जगह परमात्मा की आराधना की जाए, वह मित्र परमात्मा वहीं आ के मददगार बनता है। (पर वह) परमात्मा गुरू की कृपा से (ही मनुष्य के) मन में बस सकता है, किसी भी और तरीके से उसको पाया नहीं जा सकता।1।

हे भाई! सत्संगियों के साथ (मिल के) परमात्मा का नाम-धन कमाया जा सकता है, (सत्संग के बिना) किसी भी और जगह, किसी भी अन्य प्रयासों से (अगर) नाम-धन खरीदता है, (तो) नाशवंत चीजों के (कच्ची चीजों के) के व्यापारी (मायावी पदार्थ ही अर्थात कच्ची चीजें ही खरीदते हैं उनकी) शिक्षा से हरी-नाम-धन प्राप्त नहीं किया जा सकता।2।

हे भाई! परमात्मा का नाम (भी) धन (है, ये धन) रत्न-जवाहर-मोती (जैसा कीमती) है। प्रभू के भक्तों ने वत्र के वक्त उठ के अमृत बेला में उठ के (उस वक्त उठ के जब आत्मिक जीवन अंकुरित होता है) इस हरी-नाम-धन से सुरति जोड़ी होती है। अमृत बेला में (उठ के) बीजा हुआ ये हरी-नाम-धन भक्त जन खुद इस्तेमाल करते रहते हैं, औरों कोबाँटते रहते हैं, पर ये खत्म नहीं होता। भक्त जनों को इस लोक में परलोक में इस हरी-नाम-धन के कारण इज्जत मिलती है।3।

हे भाई! जिस हरी-नाम-धन को किसी किस्म का कोई खतरा नहीं, ये सदा ही कायम रहने वाला है, सदा ही टिका रहता है। आग-चोर-पानी-मौत, किसी के द्वारा भी इस धन का नुकसान नहीं किया जा सकता। कोई लुटेरा इस हरी-नाम-धन के नजदीक नहीं फटक सकता। जम मसूलिया इस धन को महसूल नहीं लगा सकता।4।

हे भाई! माया-ग्रसित मनुष्यों ने (सदा) पाप कर-करके माया-धन ही जोड़ा, (पर) उनके साथ (जगत से चलने के वक्त) ये धन एक कदम भी साथ नहीं निभा सका। (इस माया धन के कारण) माया-ग्रसित लोग इस लोक में दुखी ही रहे (मरने के वक्त ये धन) हाथों से छिन गया, आगे परलोक में जा के माया-ग्रसित मनुष्य को परमात्मा की हजूरी में कोई जगह नहीं मिलती।5।

हे संत जनो! इस हरी-नाम-धन का मालिक परमात्मा स्वयं ही है। जिस मनुष्य को शाहूकार-प्रभू ये धन देता है, वह मनुष्य (इस जगत में) ये हरी-नाम-सौदा कमा के यहाँ से चलता है। हे नानक! (कह–हे भाई!) इस हरी-नाम-धन के व्यापार में कभी घाटा नहीं पड़ता। गुरू ने अपने सेवक को ये बात अच्छी तरह समझा दी है।6।3।10।

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