सोरठि महला ५ ॥
गुरु पूरा भेटिओ वडभागी मनहि भइआ परगासा ॥ कोइ न पहुचनहारा दूजा अपुने साहिब का भरवासा ॥१॥ अपुने सतिगुर कै बलिहारै ॥ आगै सुखु पाछै सुख सहजा घरि आनंदु हमारै ॥ रहाउ ॥ अंतरजामी करणैहारा सोई खसमु हमारा ॥ निरभउ भए गुर चरणी लागे इक राम नाम आधारा ॥२॥ सफल दरसनु अकाल मूरति प्रभु है भी होवनहारा ॥ कंठि लगाइ अपुने जन राखे अपुनी प्रीति पिआरा ॥३॥ वडी वडिआई अचरज सोभा कारजु आइआ रासे ॥ नानक कउ गुरु पूरा भेटिओ सगले दूख बिनासे ॥४॥५॥ {पन्ना 609}
पद्अर्थ: भेटिओ = मिला है। वड भागी = बड़े भाग्यों से। मनहि = मन में। परगासा = (आत्मिक जीवन का) प्रकाश। साहिब = मालिक। भरवासा = भरोसा, सहारा।1।
कै = से। बलिहारै = सदके। आगै पाछै = लोक परलोक में, हर जगह। सहजा = सहज ही, आत्मिक अडोलता। घरि = हृदय घर में। रहाउ।
अंतरजामी = सब के दिल की जानने वाला। करणैहारा = पैदा करने वाला। सोई = वही। आधारा = आसरा।2।
सफल दरसनु = जिस (प्रभू) के दर्शन जीवन उद्देश्य पूरा करते हैं। अकाल मूरति = जिसकी हस्ती मौत से रहित है। होवनहारा = सदा ही जीवित रहने वाला। कंठि = गले से। लगाइ = लगा के।3।
कारजु = जिंदगी का मनोरथ। आइआ रासे = रास आ गया, सिरे चढ़ गया। सगले = सारे।4।
अर्थ: हे भाई! मैं अपने गुरू से कुर्बान जाता हूँ, (गुरू की कृपा से) मेरे हृदय-घर में आनंद बना रहता है, इस लोक में भी आत्मिक अडोलता (सहज अवस्था) का सुख मुझे प्राप्त हो गया है, और, परलोक में भी ये सुख टिका रहने वाला है। रहाउ।
हे भाई! बड़ी किस्मत से मुझे पूरा गुरू मिल गया है, मेरे मन में आत्मिक जीवन की समझ पैदा हो गई है। अब मुझे अपने मालिक का सहारा हो गया है, कोई उस मालिक की बराबरी नहीं कर सकता।1।
हे भाई! जब से मैं गुरू के चरणों में लगा हूँ, मुझे परमात्मा के नाम का आसरा हो गया है, कोई डर मुझे (अब) छू नहीं सकता (मुझे निश्चय हो गया है कि जो) सृजनहार सबके दिल की जानने वाला है वही मेरे सिर पर रक्षक है।2।
(हे भाई! गुरू की कृपा से मुझे विश्वास हो गया है कि) जिस परमात्मा का दर्शन मानस जनम को फल देने वाला है, जिस परमात्मा की हस्ती मौत से रहित है, वह उस वक्त भी (मेरे सर पर) मौजूद है, और, सदा कायम रहने वाला है। वह प्रभू अपनी प्रीति की अपने प्यार की दाति दे के अपने सेवकों को अपने गले से लगा लेता है।3।
हे भाई! मुझे नानक को पूरा गुरू मिल गया है, मेरे सारे दुख दूर हो गए हैं। वह गुरू बड़ी महिमावाला है, आश्चर्य शोभा वाला है, उसकी शरण पड़ने से जिंदगी का उद्देश्य प्राप्त हो जाता है।4।5।



