सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै किरपा धारी ॥ प्रभि पूरी लोच हमारी ॥ करि इसनानु ग्रिहि आए ॥ अनद मंगल सुख पाए ॥१॥ संतहु राम नामि निसतरीऐ ॥ ऊठत बैठत हरि हरि धिआईऐ अनदिनु सुक्रितु करीऐ ॥१॥ रहाउ ॥ संत का मारगु धरम की पउड़ी को वडभागी पाए ॥ कोटि जनम के किलबिख नासे हरि चरणी चितु लाए ॥२॥ उसतति करहु सदा प्रभ अपने जिनि पूरी कल राखी ॥ जीअ जंत सभि भए पवित्रा सतिगुर की सचु साखी ॥३॥ बिघन बिनासन सभि दुख नासन सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ ॥ खोए पाप भए सभि पावन जन नानक सुखि घरि आइआ ॥४॥३॥५३॥ {पन्ना 621-622}
अर्थ: हे संत जनो! परमात्मा के नाम में (जुड़ने से ही संसार समुंद्र से) पार लांघा जा सकता है। (इस वास्ते) उठते-बैठते हर वक्त नाम सिमरन करना चाहिए, (हरी-नाम सिमरन की ये) नेक कमाई हर समय करनी चाहिए।1। रहाउ।
(हे संत जनो! जब से) पूरे गुरू ने मेहर की है, प्रभू ने हमारी (नाम सिमरन की) तमन्ना पूरी कर दी है। (नाम सिमरन की बरकति से) आत्मिक स्नान करके हम अंतरात्मे टिके रहते हैं। आत्मिक आनंद आत्मिक खुशियां आत्मिक सुख भोग रहे हैं।1।
(हे संत जनो! सिमरन करना ही मनुष्य के लिए) गुरू का (बताया हुआ सही) रास्ता है, (सिमरन ही) धर्म की सीढ़ी है (जिसके द्वारा मनुष्य प्रभू-चरनों में पहुँच सकता है, पर) कोई दुर्लभ भाग्यशाली ही (ये सीढ़ी) पाता है। जो मनुष्य (सिमरन के द्वारा) परमात्मा के चरणों में चिक्त जोड़ता है, उसके करोड़ों जन्मों के पाप नाश हो जाते हैं।
हे संत जनो! जिस परमात्मा ने (सारे संसार में अपनी) पूरी सक्ता टिका रखी है, उसकी सिफत सालाह सदा करते रहा करो। हे भाई! वह सारे ही प्राणी स्वच्छ जीवन वाले बन जाते हैं, जो सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन वाली गुरू की शिक्षा को ग्रहण करते हैं।3।
हे नानक! (कह– जीवन के राह में से सारी) रुकावटें दूर करने वाला, सारे दुख नाश करने वाला हरि-नाम गुरू ने जिस लोगों के दिल में दृढ़ कर दिया, उनके सारे पाप नाश हो जाते हैं, वह सारे पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं, वह आत्मिक आनंद से अंतरात्मे टिके रहते हैं।4।3।53।



