Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar – 16-2-25

सलोकु मः ३ ॥
माइआ ममता मोहणी जिनि विणु दंता जगु खाइआ ॥ मनमुख खाधे गुरमुखि उबरे जिनी सचि नामि चितु लाइआ ॥ बिनु नावै जगु कमला फिरै गुरमुखि नदरी आइआ ॥ धंधा करतिआ निहफलु जनमु गवाइआ सुखदाता मनि न वसाइआ ॥ नानक नामु तिना कउ मिलिआ जिन कउ धुरि लिखि पाइआ ॥१॥ मः ३ ॥ घर ही महि अम्रितु भरपूरु है मनमुखा सादु न पाइआ ॥ जिउ कसतूरी मिरगु न जाणै भ्रमदा भरमि भुलाइआ ॥ अम्रितु तजि बिखु संग्रहै करतै आपि खुआइआ ॥ गुरमुखि विरले सोझी पई तिना अंदरि ब्रहमु दिखाइआ ॥ तनु मनु सीतलु होइआ रसना हरि सादु आइआ ॥ सबदे ही नाउ ऊपजै सबदे मेलि मिलाइआ ॥ बिनु सबदै सभु जगु बउराना बिरथा जनमु गवाइआ ॥ अम्रितु एको सबदु है नानक गुरमुखि पाइआ ॥२॥ पउड़ी ॥ सो हरि पुरखु अगमु है कहु कितु बिधि पाईऐ ॥ तिसु रूपु न रेख अद्रिसटु कहु जन किउ धिआईऐ ॥ निरंकारु निरंजनु हरि अगमु किआ कहि गुण गाईऐ ॥ जिसु आपि बुझाए आपि सु हरि मारगि पाईऐ ॥ गुरि पूरै वेखालिआ गुर सेवा पाईऐ ॥४॥ {पन्ना 644}

अर्थ: माया की पकड़ (भाव, ये ख्याल कि ये मेरी चीज है, ये मेरा धन है) मन को मोहने वाली है, इसने संसार को बिना दाँतों के ही खा लिया है (भाव, समूचा ही निगल लिया है), मनमुख (इस ‘ममता’ में) ग्रसे गए हैं, और जिन गुरमुखों ने सच्चे नाम में चिक्त जोड़ा है वे बच गए हैं।

सतिगुरू के सन्मुख हो के ये दिखाई दे जाता है कि संसार नाम के बिना पागल हुआ भटकता है, माया के पीछे भागता मनुष्य जन्म को निष्फल गवा लेता है और सुखदाता नाम मन में नहीं बसाता।

(पर) हे नानक! नाम उन मनुष्यों को ही मिलता है जिनके दिल में आरम्भ से ही (किए कर्मों के अनुसार) (सांस्कारिक रूप लेख) प्रभू ने उकर के रख दिए हैं।1।

(नाम-रूप) अमृत (हरेक जीव के हृदय रूप) घर में ही भरा हुआ है, (पर) मनमुखों को (उसका) स्वाद नहीं आता। जैसे हिरन (अपनी नाभि में पड़ी हुई) कस्तूरी को नहीं समझता ओर भ्रम में भूला हुआ भटकता है, वैसे ही मनुष्य नाम-अमृत को छोड़ के विष को इकट्ठा करता है, (पर उसके भी क्या वश?) करतार ने (उसके पिछले किए अनुसार) उसे खुद भटकाया हुआ है।

विरले गुरमुखों को समझ आ जाती है, उन्हें हृदय में ही (परमात्मा दिखाई दे जाता है) उनका मन और शरीर शीतल हो जाते हैं और जीभ से (जप के) उनको नाम का स्वाद आ जाता है।

सतिगुरू के शबद से ही नाम (का अंगूर हृदय में) उगता है और शबद से ही हरी से मेल होता है; शबद के बिना सारा संसार पागल हुआ पड़ा है और मानस जन्म व्यर्थ गवाता है।

हे नानक! गुरू का एक शबद ही आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल है जो सतिगुरू के सन्मुख मनुष्य को मिलता है।2।

हे भाई! बता, वह हरी, जो अगंम पुरख है, कैसे मिल सकता है? उसका कोई रूप नहीं कोई रेख नहीं, दिखता भी नहीं, उसको कैसे सिमरें? आकार के बिना है, माया से रहित है, पहुँच से परे हैं, सो, क्या कह के उसकी सिफत सालाह करें?

जिस मनुष्य को खुद प्रभू समझ देता है वह प्रभू की राह पर चलता है; पूरे गुरू ने ही उसका दीदार करवाया है, गुरू की बताई हुई कार करने से ही वह मिलता है।4।

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