सलोक मः ३ ॥
दूजै भाइ बिलावलु न होवई मनमुखि थाइ न पाइ ॥ पाखंडि भगति न होवई पारब्रहमु न पाइआ जाइ ॥ मनहठि करम कमावणे थाइ न कोई पाइ ॥ नानक गुरमुखि आपु बीचारीऐ विचहु आपु गवाइ ॥ आपे आपि पारब्रहमु है पारब्रहमु वसिआ मनि आइ ॥ जमणु मरणा कटिआ जोती जोति मिलाइ ॥१॥ मः ३ ॥ बिलावलु करिहु तुम्ह पिआरिहो एकसु सिउ लिव लाइ ॥ जनम मरण दुखु कटीऐ सचे रहै समाइ ॥ सदा बिलावलु अनंदु है जे चलहि सतिगुर भाइ ॥ सतसंगती बहि भाउ करि सदा हरि के गुण गाइ ॥ नानक से जन सोहणे जि गुरमुखि मेलि मिलाइ ॥२॥ पउड़ी ॥ सभना जीआ विचि हरि आपि सो भगता का मितु हरि ॥ सभु कोई हरि कै वसि भगता कै अनंदु घरि ॥ हरि भगता का मेली सरबत सउ निसुल जन टंग धरि ॥ हरि सभना का है खसमु सो भगत जन चिति करि ॥ तुधु अपड़ि कोइ न सकै सभ झखि झखि पवै झड़ि ॥२॥ {पन्ना 849}
अर्थ: हे भाई! माया के मोह में (टिके रहने से) आत्मिक आनंद नहीं मिलता, अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (परमात्मा की निगाहों में) कबूल नहीं होता (क्योंकि) अंदर से और व बाहर से और रहने से परमात्मा की भगती नहीं हो सकती, इस तरह परमात्मा नहीं मिल सकता। (अंदर प्रभू से प्यार ना हो तो निरे) मन के हठ से किए कर्म से कोई मनुष्य (परमात्मा की हजूरी में) परवान नहीं होता।
हे नानक! (कह- हे भाई!) अंदर से स्वै-भाव दूर करके गुरू की शरण पड़ के अपना आत्मिक जीवन पड़तालना (आत्म-चिंतन, आत्मावलोचन करना) चाहिए, (इस तरह वह) परमात्मा (जो हर जगह) स्वयं ही स्वयं है मन में आ बसता है। परमात्मा की ज्योति में (अपनी) सुरति जोड़ने से जनम-मरण के चक्कर खत्म हो जाते हैं।1।
हे प्यारे सज्जनो! एक (परमात्मा) से सुरति जोड़ के तुम आत्मिक आनंद भोगते रहो। (जो मनुष्य एक परमात्मा में सुरति जोड़ता है, उसका) सारी उम्र का दुख काटा जाता है, (क्योंकि) वह सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू में (सदा) लीन रहता है।
अगर (मनुष्य) सत्संगति में बैठ के प्यार से सदा परमात्मा की सिफत-सालाह कर के गुरू के हुकम अनुसार जीवन व्यतीत करते रहें (तो उनके अंदर) सदा आत्मिक आनंद बना रहता है। हे नानक! (कह- हे भाई!) जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहके प्रभू की याद में टिके रहते हैं, वह सुंदर आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं।1।
हे भाई! जो परमात्मा खुद सब जीवों में मौजूद है वह ही भक्तों का मित्र है। भक्तों के हृदय-घर में सदा आनंद बना रहता है (क्योंकि वह जानते हैं कि) हरेक जीव परमात्मा के वश में है (और वह परमात्मा उनका मित्र है)। परमात्मा हर जगह अपने भक्तों का साथी-मददगार है (इस वास्ते उसके) भक्त लात पर लात रख के बेफिक्र हो के सोते हैं (निष्चिंत जीवन व्यतीत करते हैं)। जो परमात्मा सब जीवों का पति है, उसको भक्त-जन (सदा अपने) हृदय में बसाए रखते हैं।
हे प्रभू! सारी दुनिया खप-खप के थक जाती है, कोई तेरे गुणों का अंत नहीं पा सकता।2।



