सूही महला ४ ॥
जिथै हरि आराधीऐ तिथै हरि मितु सहाई ॥ गुर किरपा ते हरि मनि वसै होरतु बिधि लइआ न जाई ॥१॥ हरि धनु संचीऐ भाई ॥ जि हलति पलति हरि होइ सखाई ॥१॥ रहाउ ॥ सतसंगती संगि हरि धनु खटीऐ होर थै होरतु उपाइ हरि धनु कितै न पाई ॥ हरि रतनै का वापारीआ हरि रतन धनु विहाझे कचै के वापारीए वाकि हरि धनु लइआ न जाई ॥२॥ {पन्ना 733-734}
अर्थ: हे भाई! जो हरी इस लोक में और परलोक में मित्र बनता है, उसका नाम-धन इकट्ठा करना चाहिए।1। रहाउ।
हे भाई! जिस भी जगह परमात्मा की आराधना की जाए, वह मित्र परमात्मा वहीं आ के मददगार बनता है। (पर वह) परमात्मा गुरू की कृपा से (ही मनुष्य के) मन में बस सकता है, किसी भी और तरीके से उसको पाया नहीं जा सकता।1।
हे भाई! सत्संगियों के साथ (मिल के) परमात्मा का नाम-धन कमाया जा सकता है, (सत्संग के बिना) किसी भी और जगह, किसी भी अन्य प्रयासों से (अगर) नाम-धन खरीदता है, (तो) नाशवंत चीजों के (कच्ची चीजों के) के व्यापारी (मायावी पदार्थ ही अर्थात कच्ची चीजें ही खरीदते हैं उनकी) शिक्षा से हरी-नाम-धन प्राप्त नहीं किया जा सकता।2।



