Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar -22-5-26

रागु बिहागड़ा छंत महला ४ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि नामु धिआईऐ मेरी जिंदुड़ीए गुरमुखि नामु अमोले राम ॥ हरि रसि बीधा हरि मनु पिआरा मनु हरि रसि नामि झकोले राम ॥ गुरमति मनु ठहराईऐ मेरी जिंदुड़ीए अनत न काहू डोले राम ॥ मन चिंदिअड़ा फलु पाइआ हरि प्रभु गुण नानक बाणी बोले राम ॥१॥ गुरमति मनि अम्रितु वुठड़ा मेरी जिंदुड़ीए मुखि अम्रित बैण अलाए राम ॥ अम्रित बाणी भगत जना की मेरी जिंदुड़ीए मनि सुणीऐ हरि लिव लाए राम ॥ चिरी विछुंना हरि प्रभु पाइआ गलि मिलिआ सहजि सुभाए राम ॥ जन नानक मनि अनदु भइआ है मेरी जिंदुड़ीए अनहत सबद वजाए राम ॥२॥ सखी सहेली मेरीआ मेरी जिंदुड़ीए कोई हरि प्रभु आणि मिलावै राम ॥ हउ मनु देवउ तिसु आपणा मेरी जिंदुड़ीए हरि प्रभ की हरि कथा सुणावै राम ॥ गुरमुखि सदा अराधि हरि मेरी जिंदुड़ीए मन चिंदिअड़ा फलु पावै राम ॥ नानक भजु हरि सरणागती मेरी जिंदुड़ीए वडभागी नामु धिआवै राम ॥३॥करि किरपा प्रभ आइ मिलु मेरी जिंदुड़ीए गुरमति नामु परगासे राम ॥ हउ हरि बाझु उडीणीआ मेरी जिंदुड़ीए जिउ जल बिनु कमल उदासे राम ॥ गुरि पूरै मेलाइआ मेरी जिंदुड़ीए हरि सजणु हरि प्रभु पासे राम ॥ धनु धनु गुरू हरि दसिआ मेरी जिंदुड़ीए जन नानक नामि बिगासे राम ॥४॥१॥ {पन्ना 537-538}

अर्थ: हे मेरी सोहणी जिंदे! सदा परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए परमात्मा का अमोलक नाम गुरू के द्वारा ही मिलता है। जो मन परमात्मा के नाम रस में बेधा जाता है, वह मन परमात्मा को प्यारा लगता है, वह मन आनंद से प्रभू के नाम में डुबकी लगाए रखता है।

हे मेरी सोहणी जिंदे! गुरू की मति पर चल के इस मन को (प्रभू चरणों में) टिकाना चाहिए (गुरू की मति की बरकति से मन) किसी और तरफ नहीं डोलता। हे नानक! जो मनुष्य (गुरमति पर चल के) प्रभू के गुणों वाली बाणी उच्चारता रहता है, वह मन-इच्छित फल पा लेता है।1।

हे मेरी सोहणी जिंदे! गुरू की मति की बरकति से जिस मनुष्य के मन में आत्मक जीवन देने वाला नाम-जल आ बसता है वह मनुष्य अपने मुँह से आत्मिक जीवन देने वाली बाणी सदा उचारता रहता है। हे जिंदे! परमात्मा की भक्ति करने वाले मनुष्यों की बाणी आत्मिक जीवन देने वाली है परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़ के वह बाणी मन से (ध्यान से) सुननी चाहिए (जो मनुष्य सुनता है उसे) चिरों से विछुड़ा हुआ परमात्मा आ मिलता है, आत्मिक अडोलता और प्रेम के कारण उसके गले से आ लगता है। हे दास नानक! (कह–) हे मेरी सुंदर जिंदे! उस मनुष्य के मन में आत्मिक आनंद बना रहता है, वह अपने अंदर एक-रस सिफत सालाह की बाणी का (मानो, बाजा) बजाता रहता है।2।

हे मेरी सोहणी जिंदे! (कह–) हे मेरी सखी सहेलियो! अगर कोई मेरा हरि-प्रभू को ला के मुझसे मिला दे, अगर कोई मुझे परमात्मा की सिफत-सालाह की बातें सुनाया करे, तो मैं अपना मन उसके हवाले कर दूँ। हे मेरी सोहणी जीवात्मा! गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का नाम सिमरा कर, (जो कोई सिमरता है वह) मन-इच्छित फल प्राप्त कर लेता है।

हे नानक! (कह–) हे मेरी सुंदर जीवात्मा! परमात्मा की शरण पड़ी रह। बड़े भाग्यों वाला मनुष्य ही परमात्मा का नाम सिमरता है।3।

हे मेरी सुंदर जीवात्मा! (कह–) हे प्रभू! कृपा करके मुझे आ मिल। (हे जिंदे!) गुरू की मति पर चल के ही हरि-नाम (हृदय में) चमकता है। हे मेरी सोहणी जीवात्मा! (कह–) मैं परमात्मा के बगैर कुम्हलाई रहती हूँ। हे मेरी सोहणी जीवात्मा! जिसको पूरे गुरू ने सज्जन हरि मिला दिया, उसे हरि-प्रभू अपने अंग-संग बसता दिखाई देने लग जाता है। हे दास नानक! (कह–) हे मेरी सोहणी जिंदे! गुरू सलाहने योग्य है, सदा उस्तति का पात्र है। गुरू ने जिस को (परमात्मा का) पता बता दिया (उस का हृदय) नाम की बरकति से खिल उठता है।4।1।

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