रागु सूही छंत महला ५ घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तू ठाकुरो बैरागरो मै जेही घण चेरी राम ॥ तूं सागरो रतनागरो हउ सार न जाणा तेरी राम ॥ सार न जाणा तू वड दाणा करि मिहरमति सांई ॥ किरपा कीजै सा मति दीजै आठ पहर तुधु धिआई ॥ गरबु न कीजै रेण होवीजै ता गति जीअरे तेरी ॥ सभ ऊपरि नानक का ठाकुरु मै जेही घण चेरी राम ॥१॥ तुम्ह गउहर अति गहिर ग्मभीरा तुम पिर हम बहुरीआ राम ॥ तुम वडे वडे वड ऊचे हउ इतनीक लहुरीआ राम ॥ हउ किछु नाही एको तूहै आपे आपि सुजाना ॥ अम्रित द्रिसटि निमख प्रभ जीवा सरब रंग रस माना ॥ चरणह सरनी दासह दासी मनि मउलै तनु हरीआ ॥ नानक ठाकुरु सरब समाणा आपन भावन करीआ ॥२॥ तुझु ऊपरि मेरा है माणा तूहै मेरा ताणा राम ॥ सुरति मति चतुराई तेरी तू जाणाइहि जाणा राम ॥ सोई जाणै सोई पछाणै जा कउ नदरि सिरंदे ॥ मनमुखि भूली बहुती राही फाथी माइआ फंदे ॥ ठाकुर भाणी सा गुणवंती तिन ही सभ रंग माणा ॥ नानक की धर तूहै ठाकुर तू नानक का माणा ॥३॥ हउ वारी वंञा घोली वंञा तू परबतु मेरा ओल्हा राम ॥ हउ बलि जाई लख लख लख बरीआ जिनि भ्रमु परदा खोल्हा राम ॥ मिटे अंधारे तजे बिकारे ठाकुर सिउ मनु माना ॥ प्रभ जी भाणी भई निकाणी सफल जनमु परवाना ॥ भई अमोली भारा तोली मुकति जुगति दरु खोल्हा ॥ कहु नानक हउ निरभउ होई सो प्रभु मेरा ओल्हा ॥४॥१॥४॥ {पन्ना 779}
अर्थ: हे (मेरे) राम! तू (सब जीवों का) मालिक है, तेरे पर माया अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। मेरे जैसी (तेरे दर पे) अनेकों दासियाँ हैं। हे राम! तू समुंद्र है। तू रत्नों की खान है। हे प्रभू! मैं तेरी कद्र नहीं समझ सकी।
हे मेरे मालिक! मैं (तेरे गुणों की) कद्र नहीं जानती, तू बड़ा समझदार है (सब कुछ जानने वाला है), (मेरे पर) मेहर कर। कृपा कर, मुझे ऐसी समझ बख्श कि आठों पहर मैं तेरा सिमरन करती रहूँ।
हे जिंदे! अहंकार नहीं करना चाहिए, (सबके) चरणों की धूड़ बने रहना चाहिए, तब ही तेरी उच्च आत्मिक अवस्था बन सकेगी।
हे नानक! (कह–) मेरा मालिक प्रभू सबके सिर पर है। मेरे जैसी (उसके दर पे) अनेकों दासियां हैं।1।
हे प्रभू! तू एक (अनमोल) मोती है, तू अथाह (समुंद्र) है, तू बहुत बड़े जिगरे वाला है, तू (हमारा) पति है, हम जीव तेरी पत्नियाँ हैं। तू बेअंत बड़ा है, तू बेअंत ऊँचा है। मैं बहुत ही छोटी सी हस्ती वाली हूँ।
हे भाई! मेरी कुछ भी पाया नहीं है, एक तू ही तू है, तू खुद ही खुद सब कुछ जानने वाला है। हे प्रभू! आँख झपकने जितने समय के लिए मिली तेरी अमृत-दृष्टि से मुझे आत्मिक जीवन मिल जाता है (ऐसे होता है जैसे) मैंने सारे रंग-रस भोग लिए हैं। मैंने तेरे चरणों की शरण ली है, मैं तेरे दासों की दासी हूँ (आत्मिक जीवन देने वाली तेरी निगाह की बरकति से) जब मेरा मन खिल उठता है, मेरा शरीर (भी) हरा-भरा हो जाता है।
हे नानक! (कह– हे भाई!) मालिक-प्रभू सब जीवों में समा रहा है, वह (हर वक्त हर जगह) अपनी मर्जी करता है।2।
हे राम! मेरा माण तेरे ऊपर ही है, तू ही मेरा आरसरा है। (जो भी कोई) सूझ, बुद्धि, समझदारी (मेरे अंदर है, वह) तेरी (ही बख्शी हुई है) जो कुछ तू मुझे समझाता है, वही मैं समझता हूँ।
हे भाई! वही मनुष्य (सही जीवन को) समझता-पहचानता है, जिस पर सृजनहार की मेहर की निगाह होती है। अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री अनेकों और रास्तों पर चल-चल के (सही जीवन-राह से) भटकी रहती है, माया के जंजाल में फसी रहती है। जो जीव-स्त्री मालिक-प्रभू को अच्छी लगती है, वह गुणवान हो जाती है, उसने ही सारे आत्मिक आनंद भोगे हैं।
हे ठाकुर! नानक का सहारा तू ही है, नानक का माण (भी) तू ही है।3।
हे प्रभू! मेरे लिए (तो) तू पहाड़ (के समान) ओट है, मैं तुझसे लाखों बार सदके जाती हॅूँ, जिसने (मेरे अंदर से) भटकना वाली दूरी मिटा दी है।
हे भाई! जिस जीव-स्त्री का मन मालिक-प्रभू के साथ पतीज जाता है, वह सारे विकार त्याग देती है। (उसके अंदर से माया के मोह वाले) अंधेरे दूर हो जाते हैं। (जो जीव-स्त्री) प्रभू को अच्छी लगने लग जाती है, वह (दुनिया की ओर से) बे-मुथाज हो जाती है, उसकी जिंदगी कामयाब हो जाती है, वह प्रभू दर पर कबूल हो जाती है। उसकी जिंदगी बहुत ही कीमती हो जाती है, भार वाले तोल वाली हो जाती है, उसके लिए वह दरवाजा खुल जाता है जहाँ उसको विकारों से खलासी मिल जाती है और सही जीवन की जाच आ जाती है।
हे नानक! जब से वह प्रभू मेरा सहारा बन गया है, मैं (विकारों, माया के हमलों की ओर से) निडर हो गई हूँ।4।1।4।



