सोरठि महला ५ ॥
हमरी गणत न गणीआ काई अपणा बिरदु पछाणि ॥ हाथ देइ राखे करि अपुने सदा सदा रंगु माणि ॥१॥ साचा साहिबु सद मिहरवाण ॥ बंधु पाइआ मेरै सतिगुरि पूरै होई सरब कलिआण ॥ रहाउ ॥ जीउ पाइ पिंडु जिनि साजिआ दिता पैनणु खाणु ॥ अपणे दास की आपि पैज राखी नानक सद कुरबाणु ॥२॥१६॥४४॥ {पन्ना 619}
अर्थ: हे भाई! सदा कायम रहने वाला मालिक प्रभू सदा दयावान रहता है, (कुकर्मों की ओर जा रहे लोगों को बचा के वह गुरू से मिलाता है। जिसे पूरा गुरू मिल गया, उसके विकारों के रास्ते में) मेरे पूरे गुरू ने रुकावट खड़ी कर दी (और, इस तरह उसके अंदर) सारे आत्मिक आनंद पैदा हो गए। रहाउ।
हे भाई! परमात्मा हम जीवों के किए बुरे कर्मों का कोई ख्याल नहीं करता। वह अपने मूल (प्यार भरे) स्वभाव (बिरद) को याद रखता है (वह बल्कि, हमें गुरू से मिलवा के, हमें) अपने बना के (अपना) हाथ दे के (हमें विकारों से) बचाता है। (जिस भाग्यशाली को गुरू मिल जाता है, वह) सदा ही आत्मिक आनंद लेता है।1।
हे भाई! जिस परमात्मा ने प्राण डाल के (हमारा) शरीर पैदा किया है, जो (हर वक्त) हमें खुराक और पोशाक दे रहा है, वह परमात्मा (संसार समुंद्र की विकार-लहरों से) अपने सेवक की इज्जत (गुरू को मिला के) बचाता है। हे नानक! (कह– मैं उस परमात्मा से) सदा सदके जाता हूँ।2।16।44।



