बिलावलु महला ३ ॥
पूरा थाटु बणाइआ पूरै वेखहु एक समाना ॥ इसु परपंच महि साचे नाम की वडिआई मतु को धरहु गुमाना ॥१॥ सतिगुर की जिस नो मति आवै सो सतिगुर माहि समाना ॥ इह बाणी जो जीअहु जाणै तिसु अंतरि रवै हरि नामा ॥१॥ रहाउ ॥ चहु जुगा का हुणि निबेड़ा नर मनुखा नो एकु निधाना ॥ जतु संजम तीरथ ओना जुगा का धरमु है कलि महि कीरति हरि नामा ॥२॥ जुगि जुगि आपो आपणा धरमु है सोधि देखहु बेद पुराना ॥ गुरमुखि जिनी धिआइआ हरि हरि जगि ते पूरे परवाना ॥३॥ कहत नानकु सचे सिउ प्रीति लाए चूकै मनि अभिमाना ॥ कहत सुणत सभे सुख पावहि मानत पाहि निधाना ॥४॥४॥ {पन्ना 797}
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य को गुरू की शिक्षा पर यकीन आ जाता है, वह मनुष्य गुरू (के उपदेश में) लीन रहता है। जो मनुष्य गुरू की इस बाणी से दिल से सांझ डाल लेता है, उसके अंदर परमात्मा का नाम सदा टिका रहता है।1। रहाउ।
हे भाई! देखो, पूर्ण प्रभू ने (गुरू की शरण पड़ कर हरी-नाम जपने की यह ऐसी) उक्तम जुगती बनाई है जो हरेक युग में एक जैसी ही चली आ रही है। कहीं ऐसा ना हो कि कोई मनुष्य (जत-संयम-तीर्थ आदि कर्मों) का गुमान कर बैठे। इस जगत में सदा स्थिर प्रभू का नाम जपने से ही इज्जत मिलती है।1।
हे भाई! गुरू की शरण पड़ने से चारों युगों का निर्णय समझ में आता है (कि युग चाहे कोई हो) गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्यों को परमात्मा का नाम-खजाना प्राप्त हो जाता है। (वेद आदि हिन्दू धर्म पुस्तकें बताती हैं कि) जत-संजम और तीर्थ स्नान उन युगों के धर्म थे, पर कलियुग में (गुरू नानक ने आ के बताया है कि) परमात्मा की सिफत सालाह, परमात्मा का नाम-सिमरन ही असल धर्म है।2।
हे भाई! वेद-पुराण आदि धर्म-पुस्तकों को ध्यान से पढ़ के देख लो (वह यही कहते हैं कि) हरेक युग में (जत-संजम-तीर्थ आदि) अपना-अपना धर्म (परवान) है। (पर गुरू की शिक्षा ये है कि) जिन मनुष्यों ने गुरू की शरण पड़ कर प्रभू का नाम सिमरा है, जगत में मनुष्य पूर्ण हैं, कबूल हैं।3।
हे भाई! नानक कहता है- जो मनुष्य सदा कायम रहने वाले परमात्मा से प्यार जोड़ता है, उसके मन में से (किसी भी तरह के कर्मकाण्ड का) अहंकार समाप्त हो जाता है। परमात्मा का नाम सिमरन वाले, सुनने वाले, सारे ही आत्मिक आनंद प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य (गुरू की शिक्षा पर) श्रद्धा रखते हैं, वे प्रभू का नाम-खजाना पा लेते हैं।4।4।
नोट: इस शबद में वेद-पुराणों के धर्म और गुरमति में फर्क बताया गया है।



