जैतसरी महला ५ ॥
कोई जनु हरि सिउ देवै जोरि ॥ चरन गहउ बकउ सुभ रसना दीजहि प्रान अकोरि ॥१॥ रहाउ ॥ मनु तनु निरमल करत किआरो हरि सिंचै सुधा संजोरि ॥ इआ रस महि मगनु होत किरपा ते महा बिखिआ ते तोरि ॥१॥ आइओ सरणि दीन दुख भंजन चितवउ तुम्हरी ओरि ॥ अभै पदु दानु सिमरनु सुआमी को प्रभ नानक बंधन छोरि ॥२॥५॥९॥ {पन्ना 701}
अर्थ: हे भाई! अगर कोई मनुष्य मुझे परमात्मा (के चरणों) से जोड़ दे, तो मैं उसके चरण पकड़ लूँ, मैं जीभ से (उसके धन्यवाद के) मीठे बोल बोलूँ। मेरे ये प्राण उसके आगे भेटा के तौर पर दिए जाएं।1। रहाउ।
हे भाई! कोई विरला मनुष्य परमात्मा की कृपा से अपने मन को शरीर को, पवित्र क्यारा बनाता है, उसमें प्रभू का नाम-जल अच्छी तरह सींचता है, और, बड़ी (मोहनी) माया से (संबंध) तोड़ के इस (नाम-) रस में मस्त रहता है।1।
हे दीनों के दुख नाश करने वाले! मैं तेरी शरण आया हूँ, मैं तेरा ही आसरा (अपने मन में) चितवता रहता हूँ। हे प्रभू! (मुझ) नानक के (माया वाले) बंधन छुड़वा के मुझे अपने नाम का सिमरन दे, मुझे (विकारों के मुकाबले में) निर्भैता वाली अवस्था दे।2।5।9।



