Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar – 31-1-26

सोरठि महला ४ पंचपदा ॥
अचरु चरै ता सिधि होई सिधी ते बुधि पाई ॥ प्रेम के सर लागे तन भीतरि ता भ्रमु काटिआ जाई ॥१॥ मेरे गोबिद अपुने जन कउ देहि वडिआई ॥ गुरमति राम नामु परगासहु सदा रहहु सरणाई ॥ रहाउ ॥ इहु संसारु सभु आवण जाणा मन मूरख चेति अजाणा ॥ हरि जीउ क्रिपा करहु गुरु मेलहु ता हरि नामि समाणा ॥२॥ जिस की वथु सोई प्रभु जाणै जिस नो देइ सु पाए ॥ वसतु अनूप अति अगम अगोचर गुरु पूरा अलखु लखाए ॥३॥ जिनि इह चाखी सोई जाणै गूंगे की मिठिआई ॥ रतनु लुकाइआ लूकै नाही जे को रखै लुकाई ॥४॥ सभु किछु तेरा तू अंतरजामी तू सभना का प्रभु सोई ॥ जिस नो दाति करहि सो पाए जन नानक अवरु न कोई ॥५॥९॥ {पन्ना 607}

नोट: पंच पद–पाँच बंदों वाला शबद।

अर्थ: हे मेरे गोबिंद! (मुझे) अपने दास को (ये) आदर दे (कि) गुरू की मति से (मेरे अंदर) अपना नाम प्रगट कर दे, (मुझे) सदा अपनी शरण में रख। रहाउ।

(हे भाई! गुरू की शरण पड़ कर जब) मनुष्य इस अजीत मन को जीत लेता है, तब (जीवन-संग्राम में इसको) कामयाबी हो जाती है, (इस) कामयाबी से (मनुष्य को) ये समझ आ जाती है (कि) परमात्मा के प्यार के तीर (इसके) हृदय में भेदे जाते हैं, तब (इसके मन की) भटकना (सदा के लिए) कट जाती है।1।

हे मूर्ख अंजान मन! ये जगत (का मोह) जनम-मरण (का कारण बना रहता) है, (इससे बचने के लिए परमात्मा का नाम) सिमरता रह। हे हरी! (मेरे पर) मेहर कर, मुझे गुरू मिला, तभी तेरे नाम में लीनता हो सकती है।2।

हे भाई! ये नाम-वस्तु जिस (परमात्मा) की (मल्कियत) है, वही जानता है (कि ये वस्तु किसे देनी है), जिस जीव को प्रभू ये दाति देता है वही ले सकता है। ये वस्तु ऐसी सुंदर है कि जगत में इस जैसी और कोई नहीं, (किसी चतुराई समझदारी से) इस तक पहुँच नहीं हो सकती, मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों की भी इस तक पहुँच नहीं। (अगर) पूरा गुरू (मिल जाए, तो वही) अदृश्य प्रभू के दीदार करवा सकता है।3।

हे भाई! जिस मनुष्य ने ये नाम-वस्तु चखी है (इसका स्वाद) वही जानता है, (वह बयान नहीं कर सकता, जैसे) गूँगे की (खाई) मिठाई (का स्वाद) गूँगा बता नहीं सकता। (हाँ, अगर किसी को ये नाम-रत्न हासिल हो जाए, तो) अगर वह मनुष्य (इस रत्न को अपने अंदर) छुपा के रखना चाहे, तो छुपाने से ये रत्न नहीं छुपता (उसके आत्मिक जीवन से रत्न-प्राप्ति के लक्षण दिख पड़ते हैं)।4।

हे प्रभू! ये सारा जगत तेरा ही बनाया हुआ है, तू सब जीवों के दिल की जानने वाला है, तू सबकी सार लेने वाला मालिक है। हे नानक! (कह– हे प्रभू!) वही मनुष्य तेरा नाम हासिल कर सकता है जिसको तू ये दाति बख्शता है। और कोई भी ऐसा जीव नहीं (जो तेरी कृपा के बिना तेरा नाम प्राप्त कर सके)।5।9।

जरूरी नोट: इस राग में गुरू नानक देव जी के सारे ही शबदों में ‘रहाउ’ की तुकों के साथ सिर्फ ‘रहाउ’ आया है, ना कि “॥१॥ रहाउ॥ ”। यही समानता गुरू अमरदास जी और गुरू रामदास जी के शबदों में मिलती है। गुरू नानक देव जी की सारी बाणी इन गुरू साहिबानों के पास मौजूद थी।

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