Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar – 30-1-26

बिलावलु महला ५ छंत मंगल ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सलोकु ॥
सुंदर सांति दइआल प्रभ सरब सुखा निधि पीउ ॥ सुख सागर प्रभ भेटिऐ नानक सुखी होत इहु जीउ ॥१॥ छंत ॥ सुख सागर प्रभु पाईऐ जब होवै भागो राम ॥ माननि मानु वञाईऐ हरि चरणी लागो राम ॥ छोडि सिआनप चातुरी दुरमति बुधि तिआगो राम ॥ नानक पउ सरणाई राम राइ थिरु होइ सुहागो राम ॥१॥ सो प्रभु तजि कत लागीऐ जिसु बिनु मरि जाईऐ राम ॥ लाज न आवै अगिआन मती दुरजन बिरमाईऐ राम ॥ पतित पावन प्रभु तिआगि करे कहु कत ठहराईऐ राम ॥ नानक भगति भाउ करि दइआल की जीवन पदु पाईऐ राम ॥२॥ स्री गोपालु न उचरहि बलि गईए दुहचारणि रसना राम ॥ प्रभु भगति वछलु नह सेवही काइआ काक ग्रसना राम ॥ भ्रमि मोही दूख न जाणही कोटि जोनी बसना राम ॥ नानक बिनु हरि अवरु जि चाहना बिसटा क्रिम भसमा राम ॥३॥ लाइ बिरहु भगवंत संगे होइ मिलु बैरागनि राम ॥ चंदन चीर सुगंध रसा हउमै बिखु तिआगनि राम ॥ ईत ऊत नह डोलीऐ हरि सेवा जागनि राम ॥ नानक जिनि प्रभु पाइआ आपणा सा अटल सुहागनि राम ॥४॥१॥४॥ {पन्ना 847-848}

अर्थ: सलोक- हे नानक! प्रभू-पति सुंदर है शांति-रूप है, दया का श्रोत है और सारे सुखों का खजाना है। अगर वह सुखों का समुंद्र प्रभू मिल जाए, तो यह जिंद सुखी हो जाती है।1।

छंत- हे गौरवमयी जीव सि्त्रये! जब (माथे के) भाग्य जागते हैं तब सुखों का समुंद्र प्रभू मिल जाता है (पर उसको मिलने के लिए अपने अंदर से) अहंकार दूर कर लेना चाहिए। हे जीव-स्त्री! (गुमान त्याग के) प्रभू के चरणों में जुड़ी रह, समझदारी चतुराई छोड़ दे, खोटी मति-बुद्धि (अपने अंदर से) दूर कर। हे नानक! (कह-हे जीव स्त्री!) प्रभू पातशाह की शरण पड़ी रह, (तो ही तेरे सिर पर तेरे सिर का) साई (पति-प्रभू) सदा टिका रहेगा।1।

हे भाई! जिस (परमात्मा की याद) के बिना आत्मिक मौत सहेड़ ली जाती है, उसको भुला के किसी और जगह लीन नहीं होना चाहिए। पर जिस मनुष्य की मति आत्मिक जीवन की ओर से कोरी है (प्रभू की याद को भुला के) उसको शर्म नहीं आती, वह मनुष्य बुरे लोगों में खचित रहता है। हे भाई! विकारियों को पवित्र करने वाले प्रभू को भुला के और शांति कहाँ आ सकती है? प्रभू से प्यार डाले रख (इस तरह) आत्मिक जीवन वाला (ऊँचा) दर्जा मिल जाता है।2।

हे (निंदा-ईष्या की आग में) जल रही (जीभ!) (निंदा करने के) बुरे काम में व्यस्त हे जीभ! तू सृष्टि के पालनहार प्रभू (का नाम) याद नहीं करती। हे जिंदे! जो प्रभू भगती से प्यार करने वाला है, तू उसकी सेवा-भक्ति नहीं करती, (तेरे इस) शरीर को (कामादिक) कौऐ (अंदर ही अंदर से) खाए जा रहे हैं।

हे जिंदे! भटकना के कारण तू (आत्मिक सरमाया) लुटाए जा रही है, (नाम भुला के) करोड़ों जूनियों में पड़ना पड़ता है, तू इन दुखों को नहीं समझती! हे नानक! (कह- हे जिंदे!) परमात्मा के बिना किसी और को प्यार करना जो है, (वह इस तरह है जैसे) विष्ठा के कीड़े का (विकारों के गंद में पड़े रह के) आत्मिक जीवन (जल के) राख हो जाता है।3।

हे सहेलिये! भगवान से प्रीति बनाए रख। (दुनियावी पदार्थों की ओर से) वैरागिन हो के (मोह तोड़ कर प्रभू के चरणों में) जुड़ी रह। (जो जीव-सि्त्रयां प्रभू चरणों में जुड़ी रहती हैं, वह) चंदन, सुंदर कपड़े, सुगन्धियां, स्वादिष्ट भोजन (आदि से पैदा होने वाली) आत्मिक मौत लाने वाले अहंकार के जहर को त्याग देती हैं। (हे सहेलिए! इन रसों की खातिर) इधर-उधर डोलना नहीं चाहिए, (पर इनकी तरफ से) वही सचेत रहती हैं जो प्रभू की सेवा-भक्ति में लीन रहती हैं।

हे नानक! जिस (जीव-स्त्री) ने अपने प्रभू (का मिलाप) हासल कर लिया, वह सदा के लिए पति वाली (सोहागिन) हो जाती है।4।1।4।

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