बिहागड़ा महला ५ छंत घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि का एकु अच्मभउ देखिआ मेरे लाल जीउ जो करे सु धरम निआए राम ॥ हरि रंगु अखाड़ा पाइओनु मेरे लाल जीउ आवणु जाणु सबाए राम ॥ आवणु त जाणा तिनहि कीआ जिनि मेदनि सिरजीआ ॥ इकना मेलि सतिगुरु महलि बुलाए इकि भरमि भूले फिरदिआ ॥ अंतु तेरा तूंहै जाणहि तूं सभ महि रहिआ समाए ॥ सचु कहै नानकु सुणहु संतहु हरि वरतै धरम निआए ॥१॥ आवहु मिलहु सहेलीहो मेरे लाल जीउ हरि हरि नामु अराधे राम ॥ करि सेवहु पूरा सतिगुरू मेरे लाल जीउ जम का मारगु साधे राम ॥ मारगु बिखड़ा साधि गुरमुखि हरि दरगह सोभा पाईऐ ॥ जिन कउ बिधातै धुरहु लिखिआ तिन्हा रैणि दिनु लिव लाईऐ ॥ हउमै ममता मोहु छुटा जा संगि मिलिआ साधे ॥ जनु कहै नानकु मुकतु होआ हरि हरि नामु अराधे ॥२॥ कर जोड़िहु संत इकत्र होइ मेरे लाल जीउ अबिनासी पुरखु पूजेहा राम ॥ बहु बिधि पूजा खोजीआ मेरे लाल जीउ इहु मनु तनु सभु अरपेहा राम ॥ मनु तनु धनु सभु प्रभू केरा किआ को पूज चड़ावए ॥ जिसु होइ क्रिपालु दइआलु सुआमी सो प्रभ अंकि समावए ॥ भागु मसतकि होइ जिस कै तिसु गुर नालि सनेहा ॥ जनु कहै नानकु मिलि साधसंगति हरि हरि नामु पूजेहा ॥३॥दह दिस खोजत हम फिरे मेरे लाल जीउ हरि पाइअड़ा घरि आए राम ॥ हरि मंदरु हरि जीउ साजिआ मेरे लाल जीउ हरि तिसु महि रहिआ समाए राम ॥ सरबे समाणा आपि सुआमी गुरमुखि परगटु होइआ ॥ मिटिआ अधेरा दूखु नाठा अमिउ हरि रसु चोइआ ॥ जहा देखा तहा सुआमी पारब्रहमु सभ ठाए ॥ जनु कहै नानकु सतिगुरि मिलाइआ हरि पाइअड़ा घरि आए ॥४॥१॥ {पन्ना 541-542}
अर्थ: हे मेरे प्यारे! मैंने परमात्मा का एक आश्चर्यजनक तमाशा देखा है कि वह जो कुछ करता है धर्म के अनुसार करता है। हे मेरे प्यारे! (ये जगत) उस परमात्मा ने एक अखाड़ा बना दिया है, एक रंग-भूमि रच दी है जिस में सारे (नटों के लिए, पहलवानों के लिए) पैदा होना मरना (भी नियत कर दिया है)। (जगत में जीवों का) पैदा होना मरना उसी परमात्मा ने बनाया है जिसने ये जगत पैदा किया है। कई जीवों को गुरू मिला के प्रभू अपनी हजूरी में टिका लेता है (ठिकाना दे देता है), और, कई जीव कुर्माग पड़ कर भटकते फिरते हैं।
हे प्रभू! अपने (गुणों का) अंत तू खुद ही जानता है, तू सारी सुष्टि में व्यापक है। हे संत जनो! सुनो, नानक एक अटल नियम बताता है (कि) परमात्मा धर्म अनुसार न्याय के मुताबक दुनिया की कार चला रहा है।1।
हे मेरे प्यारे! (कह–) हे संत-जन सहेलियो! आओ, मिल के संत-संग में बैठो, (जो मनुष्य सत्संगियों में मिल के बैठता है वह) परमात्मा का नाम सदा सिमरता है। हे मेरे प्यारे! गुरू को अभॅुल मान के गुरू की शरण पड़ो (जो इस तरह गुरू की शरण पड़ता है वह) जम के रास्ते को (आत्मक मौत लाने वाले जीवन-राह को) अच्छा बना लेता है। गुरू की शरण पड़ कर मुश्किल जीवन राह को (सुंदर व) आसान बना के परमात्मा की हजूरी में शोभा कमाई जा सकती है। (पर) जिन मनुष्यों के माथे पर अपनी हजूरी से विधाता ने (भक्ति का लेख) लिख दिया है, उन मनुष्यों की सुरति दिन-रात (प्रभू चरनों में) लगी रहती है। जब मनुष्य गुरू की संगति में मिलता है तब उसके अंदर से अहंकार ममता (अपनत्व) दूर हो जाते हैं, मोह समाप्त हो जाता है। दास नानक कहता है कि सदा परमात्मा का नाम सिमर के मनुष्य (अहंकार, ममता, मोह आदि के प्रभाव से) स्वतंत्र हो जाता है।2।
हे मेरे प्यारे! (कह–) हे संत जनों! (साध-संगत में) एकत्र हो के परमात्मा के आगे दोनों हाथ जोड़ा करो, और, उस नाश रहित सर्व व्यापक परमात्मा की भक्ति किया करो। हे मेरे प्यारे! मैंने और कई किस्मों की पूजा-भेटा तलाश के देखी है (पर, सबसे श्रेष्ठ पूजा ये है कि) अपना ये मन ये शरीर सब भेटा कर देना चाहिए। (फिर भी, गुमान किस बात का?) ये मन, ये शरीर, ये धन सब परमात्मा का दिया हुआ है, (सो,) कोई मनुष्य (अपनी मल्कियत की) कौन सी चीज भेटा कर सकता है? जिस मनुष्य पर प्रभू मालिक कृपाल होता है दयावान होता है वह उस परमात्मा के चरणों में लीन हो जाता है (बस! यही भेटा और पूजा)। जिस मनुष्य के माथे पर भाग्य जाग उठते हैं, उसका अपने गुरू के साथ प्यार बन जाता है। दास नानक कहता है– (हे संत जनों!) साध-संगत में मिल के परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए।3।
हे मेरे प्यारे! (परमात्मा को ढूँढने के लिए) हम दसों दिशाओं में तलाश करते फिरे, पर उस परमात्मा को अब हृदय घर में ही आ के ढूँढ लिया है। हे मेरे प्यारे! (इस मनुष्य शरीर को) परमात्मा ने अपना निवास स्थान बनाया हुआ है, परमात्मा इस (शरीर घर) में टिका रहता है। मालिक प्रभू स्वयं ही सारे जीवों में व्यापक हो रहा है, पर उसके इस अस्तित्व की समझ गुरू की शरण पड़ने से ही आती है। (गुरू जिस मनुष्य के मुँह में) आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल नाम-रस चोआ देता है, (उसके अंदर से माया के मोह का) अंधकार मिट जाता है, उसका सारा दुख दूर हो जाता है। (गुरू की कृपा से अब) मैं जिधर देखता हूँ उधर ही मुझे मालिक परमात्मा हर जगह बसता दिखाई देता है। दास नानक कहता है– गुरू ने मुझे परमात्मा मिला दिया है, मैंने परमात्मा को अपने हृदय-घर में ढूँढ लिया है।4।1।



