रागु धनासरी बाणी भगत कबीर जी की ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सनक सनंद महेस समानां ॥ सेखनागि तेरो मरमु न जानां ॥१॥ संतसंगति रामु रिदै बसाई ॥१॥ रहाउ ॥ हनूमान सरि गरुड़ समानां ॥ सुरपति नरपति नही गुन जानां ॥२॥ चारि बेद अरु सिम्रिति पुरानां ॥ कमलापति कवला नही जानां ॥३॥ कहि कबीर सो भरमै नाही ॥ पग लगि राम रहै सरनांही ॥४॥१॥ {पन्ना 691}
अर्थ: मैं संतों की संगति में रह के परमात्मा को अपने हृदय में बसाता हूँ।1। रहाउ।
हे प्रभू! (ब्रहमा के पुत्रों) सनक, सनंद और शिव जी जैसों ने तेरा भेद नहीं पाया; (विष्णु के भक्त) शेशनाग ने तेरे (दिल का) राज़ नहीं समझा।1।
(श्री राम चंद्र जी के सेवक) हनूमान जैसों ने, (विष्णु के सेवक और पक्षियों के राजे) गरुड़ जैसों ने, देवाताओं के राजे इन्द्र ने, बड़े-बड़े राजाओं ने भी तेरे गुणों का अंत नहीं पाया।2।
चार वेद, (अठारह) स्मृतियों, (अठारह) पुराणों- (इनके कर्ता ब्रहमा, मनू और ऋषियों) ने तुझे नहीं समझा, विष्णु और लक्ष्मी ने भी तेरा अंत नहीं पाया।3।
कबीर कहता है– (बाकी सारी सृष्टि के लोग प्रभू को छोड़ के और ही तरफ भटकते रहे) एक वह मनुष्य नहीं भटकता, जो (संतों की) चरणों में लग के परमात्मा की शरण में टिका रहता है।4।1।
शबद का भाव: अन्य-पूजा छोड़ के एक परमात्मा का भजन करो। ब्रहमा, शिव, विष्णु, इन्द्र आदि और उनके सेवक परमात्मा का अंत नहीं पा सके।1।



