रागु सूही छंत महला ४ घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आवहो संत जनहु गुण गावह गोविंद केरे राम ॥ गुरमुखि मिलि रहीऐ घरि वाजहि सबद घनेरे राम ॥ सबद घनेरे हरि प्रभ तेरे तू करता सभ थाई ॥ अहिनिसि जपी सदा सालाही साच सबदि लिव लाई ॥ अनदिनु सहजि रहै रंगि राता राम नामु रिद पूजा ॥ नानक गुरमुखि एकु पछाणै अवरु न जाणै दूजा ॥१॥ सभ महि रवि रहिआ सो प्रभु अंतरजामी राम ॥ गुर सबदि रवै रवि रहिआ सो प्रभु मेरा सुआमी राम ॥ प्रभु मेरा सुआमी अंतरजामी घटि घटि रविआ सोई ॥ गुरमति सचु पाईऐ सहजि समाईऐ तिसु बिनु अवरु न कोई ॥ सहजे गुण गावा जे प्रभ भावा आपे लए मिलाए ॥ नानक सो प्रभु सबदे जापै अहिनिसि नामु धिआए ॥२॥ इहु जगो दुतरु मनमुखु पारि न पाई राम ॥ अंतरे हउमै ममता कामु क्रोधु चतुराई राम ॥ अंतरि चतुराई थाइ न पाई बिरथा जनमु गवाइआ ॥ जम मगि दुखु पावै चोटा खावै अंति गइआ पछुताइआ ॥ बिनु नावै को बेली नाही पुतु कुट्मबु सुतु भाई ॥ नानक माइआ मोहु पसारा आगै साथि न जाई ॥३॥ हउ पूछउ अपना सतिगुरु दाता किन बिधि दुतरु तरीऐ राम ॥ सतिगुर भाइ चलहु जीवतिआ इव मरीऐ राम ॥ जीवतिआ मरीऐ भउजलु तरीऐ गुरमुखि नामि समावै ॥ पूरा पुरखु पाइआ वडभागी सचि नामि लिव लावै ॥ मति परगासु भई मनु मानिआ राम नामि वडिआई ॥ नानक प्रभु पाइआ सबदि मिलाइआ जोती जोति मिलाई ॥४॥१॥४॥ {पन्ना 775}
अर्थ: हे संत जनो! आओ, (साध-संगति में मिल के) परमात्मा के गुण गाते रहें। (हे संत जनों!) गुरू की शरण पड़ कर (प्रभू चरणों में) जुड़े रहना चाहिए (प्रभू चरणों में जुड़ने की बरकति से) हृदय-घर में प्रभू की सिफत-सालाह के शबद अपना प्रभाव डाले रखते हैं।
हे प्रभू! (ज्यों-ज्यों) तेरी सिफत सालाह के शबद (मनुष्य के हृदय में) प्रभाव डालते हैं, (त्यों-त्यों तू, हे प्रभू!) उसको हर जगह बसता दिखाई देता है। (हे प्रभू! मेरे ऊपर भी मेहर कर) मैं दिन-रात तेरा नाम जपता रहूँ, मैं सदा तेरी सिफत-सालाह करता रहूँ, मैं तेरी सदा सिफत सालाह में सुरति जोड़े रखूँ।
हे नानक! जो मनुष्य परमात्मा के नाम को अपने हृदय की पूजा बनाता है (भाव, हर वक्त हृदय में बसाए रखता है) वह मनुष्य हर समय आत्मिक अडोलता में टिका रहता है, वह मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा रहता है। गुरू की शरण पड़ कर वह एक प्रभू के साथ ही सांझ डाले रखता है, किसी और दूसरे के साथ सांझ नहीं डालता।1।
हे भाई! वह परमात्मा हरेक के दिल की जानने वाला है, और सब जीवों में व्यापक है। (पर जो मनुष्य) गुरू के शबद के द्वारा (उसको) सिमरता है, उसको ही वह मालिक प्रभू (सब जगह) व्यापक दिखाई देता है। (उस मनुष्य को ये निश्चय हो जाता है कि कहीं भी) उस परमात्मा के बिना और कोई नहीं।
हे भाई! (प्रभू की अपनी ही मेहर से) अगर मैं उस प्रभू को अच्छा लग पड़ूँ, तो आत्मिक अडोलता में टिक के मैं उसके गुण गा सकता हूँ, वह खुद ही (जीव को अपने साथ) मिलाता है। हे नानक! गुरू के शबद के द्वारा ही उस प्रभू के साथ गहरी सांझ पड़ सकती है (जो मनुष्य शबद में) जुड़ता है, (वह) दिन-रात परमात्मा का नाम सिमरता रहता है।2।
हे भाई! ये जगत (एक ऐसा समुंद्र है, जिससे) पार लांघना मुश्किल है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (इसके) दूसरे छोर पर नहीं पहुँच सकता, (क्योंकि उसके) अंदर ही अहंकार, अस्लियत की लालसा, काम, क्रोध चतुराई (आदि बुराईयाँ) टिकी रहती हैं।
हे भाई! (जिस मनुष्य के) अंदर अपनी समझदारी का मान टिका रहता है वह मनुष्य (प्रभू के दर पर) प्रवान नहीं होता, वह अपना मानस जन्म व्यर्थ गवा लेता है। (वह मनुष्य सारी उम्र) जमराज के रास्ते पर चलता है, दुख सहता है (आत्मिक मौत की) चोटें खाता रहता है, अंत के समय यहाँ से हाथ मलता जाता है। हे भाई! (जीवन-यात्रा में यहाँ) पुत्र, परिवार, भाई – इनमें से कोई भी मददगार नहीं, परमात्मा के नाम के बिना कोई बेली नहीं बनता। हे नानक! ये सारा माया के मोह का पसारा (ही) है, परलोक में (भी मनुष्य के) साथ नहीं जाता।3।
हे भाई! (जब) मैं (नाम की) दाति देने वाले अपने गुरू को पूछता हूँ कि ये दुष्तर संसार-समुंद्र कैसे पार लांघा जा सकता है (तो आगे से उक्तर मिलता है कि) गुरू की रजा में (जीवन की चाल) चलते रहो, इस तरह दुनिया की किरत-कार करते हुए ही विकारों से बचे रहा जा सकता है। (गुरू की रजा में चलने से) दुनिया के काम करते हुए ही विकारों की ओर से मृतक रहा जाता है, संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है। (क्योंकि) जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है, वह परमात्मा के नाम में लीन रहता है उसको बड़े-भाग्यों से सारे गुणों से भरपूर प्रभू मिल जाता है, सदा स्थिर हरी नाम में वह सुरति जोड़े रखता है। उसकी मति में आत्मिक जीवन की सूझ का प्रकाश हो जाता है, उसका मन नाम में पतीज जाता है, उसको नाम की बरकति से (लोक-परलोक में) इज्जत मिल जाती है। हे नानक! जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ता है उसे प्रभू मिल जाता है, उसकी जीवात्मा प्रभू की ज्योति में एक-मेक हुई रहती है।4।1।4।



