सूही महला ३ ॥
जे लोड़हि वरु बालड़ीए ता गुर चरणी चितु लाए राम ॥ सदा होवहि सोहागणी हरि जीउ मरै न जाए राम ॥ हरि जीउ मरै न जाए गुर कै सहजि सुभाए सा धन कंत पिआरी ॥ सचि संजमि सदा है निरमल गुर कै सबदि सीगारी ॥ मेरा प्रभु साचा सद ही साचा जिनि आपे आपु उपाइआ ॥ नानक सदा पिरु रावे आपणा जिनि गुर चरणी चितु लाइआ ॥१॥ पिरु पाइअड़ा बालड़ीए अनदिनु सहजे माती राम ॥ गुरमती मनि अनदु भइआ तितु तनि मैलु न राती राम ॥ तितु तनि मैलु न राती हरि प्रभि राती मेरा प्रभु मेलि मिलाए ॥ अनदिनु रावे हरि प्रभु अपणा विचहु आपु गवाए ॥ गुरमति पाइआ सहजि मिलाइआ अपणे प्रीतम राती ॥ नानक नामु मिलै वडिआई प्रभु रावे रंगि राती ॥२॥ पिरु रावे रंगि रातड़ीए पिर का महलु तिन पाइआ राम ॥ सो सहो अति निरमलु दाता जिनि विचहु आपु गवाइआ राम ॥ विचहु मोहु चुकाइआ जा हरि भाइआ हरि कामणि मनि भाणी ॥ अनदिनु गुण गावै नित साचे कथे अकथ कहाणी ॥ जुग चारे साचा एको वरतै बिनु गुर किनै न पाइआ ॥ नानक रंगि रवै रंगि राती जिनि हरि सेती चितु लाइआ ॥३॥ कामणि मनि सोहिलड़ा साजन मिले पिआरे राम ॥ गुरमती मनु निरमलु होआ हरि राखिआ उरि धारे राम ॥ हरि राखिआ उरि धारे अपना कारजु सवारे गुरमती हरि जाता ॥ प्रीतमि मोहि लइआ मनु मेरा पाइआ करम बिधाता ॥ सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ हरि वसिआ मंनि मुरारे ॥ नानक मेलि लई गुरि अपुनै गुर कै सबदि सवारे ॥४॥५॥६॥ {पन्ना 772}
अर्थ: हे अंजान जीव स्त्री! अगर तू प्रभू पति का मिलाप चाहती है, तो अपने गुरू के चरणों में चिक्त जोड़ के रख। तू सदा के लिए सोहाग-भाग वाली बन जाएगी, (क्योंकि) प्रभू-पति ना कभी मरता है ना कभी नाश होता है। जो जीव-स्त्री गुरू के द्वारा आत्मिक अडोलता में प्रेम में लीन रहती है, वह पति-प्रभू को प्यारी लगती है। सदा-स्थिर प्रभू में जुड़ के, (विकारों पर) संयम रख के, वह जीव-स्त्री पवित्र जीवन वाली हो जाती है, गुरू के शबद की बरकति से वह अपने आत्मिक जीवन को सुंदर बना लेती है। हे सहेलिए! मेरा प्रभू सदा कायम रहने वाला है, उसने अपने आप को आप ही प्रकट किया हुआ है। हे नानक! जिस जीव-स्त्री ने गुरू के चरणों में अपना मन जोड़ लिया, वह सदा प्रभू पति के मिलाप का आनंद भोगती है।1।
हे अंजान जीव-स्त्री! जो जीव-स्त्री प्रभू-पति का मिलाप हासिल कर लेती है, वह हर वक्त आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है। गुरू की मति के सदका उसके मन में आनंद बना रहता है, (उसके) शरीर में (विचारों की) रक्ती भर भी मैल नहीं होती। (उसके) शरीर में रक्ती भर भी मैल नहीं होती, वह प्रभू (के प्रेम-रंग में) रंगी रहती है प्रभू उसको अपने चरणों में मिला लेता है। वह जीव-स्त्री अपने अंदर से स्वै भाव दूर करके हर वक्त अपने हरी-प्रभू को सिमरती रहती है। गुरू की शिक्षा के साथ प्रभू से मिल जाती है, गुरू उसको आत्मिक अडोलता में टिका देता है, वह अपने प्रभू-प्रीतम के रंग में रंगी जाती है। हे नानक! उसको हरी-नाम मिल जाता है, इज्जत मिल जाती है, वह प्रेम-रंग में रंगी हुई हर वक्त प्रभू का सिमरन करती है।2।
हे प्रभू के प्रेम-रंग में रंगी हुई जीव-स्त्री! जो जीव-स्त्री प्रभू-पति को हर वक्त सिमरती है, जिसने अपने अंदर से स्वैभाव दूर कर दिया है, उसने उस प्रभू की हजूरी प्राप्त कर ली है जो बहुत पवित्र है, और, सबको दातें देने वाला है।
जब प्रभू की रजा होती है, तब जीव-स्त्री अपने अंदर से मोह दूर करती है, और, प्रभू के मन को प्यारी लगने लगती है। फिर वह हर वक्त सदा-स्थिर प्रभू के गुण गाती रहती है, और उस प्रभू की सिफत सालाह की बातें करती है जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।
हे सखिए! चारों युगों में वह सदा-स्थिर प्रभू खुद ही अपना हुकम बरता रहा है, पर गुरू की शरण के बिना किसी ने भी उसका मिलाप हासिल नहीं किया। हे नानक! जिस जीव-स्त्री ने परमात्मा से अपना मन जोड़ लिया, वह उसके प्रेम-रंग में रंगी हुई उसके प्रेम में उसका सिमरन करती है।3।
जिस जीव स्त्री को प्यारे सज्जन प्रभू जी मिल जाते हैं, उसके मन में आनंद बना रहता है। गुरू की मति पर चल कर उसका मन पवित्र हो जाता है, वह अपने दिल में हरी-प्रभू को टिकाए रखती है। वह जीव-स्त्री परमात्मा को अपने हृदय में बसाए रखती है, इस तरह अपने जीवन के उद्देश्य को सँवार लेती है, गुरू की शिक्षा की बरकति से वह परमात्मा के साथ गहरी सांझ बना लेती है। उसका मन, जो पहले ममता में फसा हुआ था, प्रीतम प्रभू ने अपने बस में कर लिया, और, उस जीव-स्त्री ने सदा आत्मिक आनंद पाया है, मुरारी प्रभू उस के मन में आ बसा है। हे नानक! गुरू के शबद की बरकति से उस जीव-स्त्री ने अपना जीवन सुंदर बना लिया है, प्यारे गुरू ने उसको प्रभू-चरणों में जोड़ दिया है।4।5।6।



