Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar -20-4-26

बिलावलु महला ४ ॥
अंतरि पिआस उठी प्रभ केरी सुणि गुर बचन मनि तीर लगईआ ॥ मन की बिरथा मन ही जाणै अवरु कि जाणै को पीर परईआ ॥१॥ राम गुरि मोहनि मोहि मनु लईआ ॥ हउ आकल बिकल भई गुर देखे हउ लोट पोट होइ पईआ ॥१॥ रहाउ ॥ हउ निरखत फिरउ सभि देस दिसंतर मै प्रभ देखन को बहुतु मनि चईआ ॥ मनु तनु काटि देउ गुर आगै जिनि हरि प्रभ मारगु पंथु दिखईआ ॥२॥ कोई आणि सदेसा देइ प्रभ केरा रिद अंतरि मनि तनि मीठ लगईआ ॥ मसतकु काटि देउ चरणा तलि जो हरि प्रभु मेले मेलि मिलईआ ॥३॥ चलु चलु सखी हम प्रभु परबोधह गुण कामण करि हरि प्रभु लहीआ ॥ भगति वछलु उआ को नामु कहीअतु है सरणि प्रभू तिसु पाछै पईआ ॥४॥ खिमा सीगार करे प्रभ खुसीआ मनि दीपक गुर गिआनु बलईआ ॥ रसि रसि भोग करे प्रभु मेरा हम तिसु आगै जीउ कटि कटि पईआ ॥५॥ हरि हरि हारु कंठि है बनिआ मनु मोतीचूरु वड गहन गहनईआ ॥ हरि हरि सरधा सेज विछाई प्रभु छोडि न सकै बहुतु मनि भईआ ॥६॥ कहै प्रभु अवरु अवरु किछु कीजै सभु बादि सीगारु फोकट फोकटईआ ॥ कीओ सीगारु मिलण कै ताई प्रभु लीओ सुहागनि थूक मुखि पईआ ॥७॥ हम चेरी तू अगम गुसाई किआ हम करह तेरै वसि पईआ ॥ दइआ दीन करहु रखि लेवहु नानक हरि गुर सरणि समईआ ॥८॥५॥८॥ {पन्ना 836}

हे (मेरे) राम! प्यारे गुरू ने (मेरा) मन अपने वश में कर लिया है। गुरू के दर्शन करके (अब) मैं अपनी चतुराई समझदारी गवा बैठी हूँ, मेरा अपना आप मेरे वश में नहीं रहा (मेरा मन और मेरी ज्ञान इन्द्रियां गुरू के वश में हो गई हैं)।1। रहाउ।

हे भाई! गुरू के बचन सुन के (ऐसे हुआ है जैसे मेरे) मन में (बिरह के) तीर लग गए हैं, मेरे अंदर प्रभू के दर्शन की तमन्ना पैदा हो गई है। हे भाई! (मेरे) मन की (इस वक्त की) पीड़ा को (मेरा अपना) मन ही जानता है। कोई और पराई पीड़ा को क्या जान सकता है?।1।

हे भाई! (मेरे) मन में प्रभू के दर्शन करने की तीव्र इच्छा पैदा हो चुकी है, मैं सारे देशों-देशांतरों में (उसको) तलाशती फिरती हूँ (थी)। जिस (गुरू) ने (मुझे) प्रभू (के मिलाप) का रास्ता दिखा दिया है, उस गुरू के आगे मैंअपना तन काट के भेट कर रही हूँ (अपना आप गुरू के हवाले कर रही हूँ)।2।

हे भाई! (अब अगर) कोई प्रभू का संदेश ला के (मुझे) देता है, तो वह मेरे दिल, मेरे मन, मेरे तन को प्यारा लगता है। हे भाई! जो कोई सज्जन मुझे प्रभू से मिलाता है, मैं अपना सिर काट के उसके पैरों के नीचे रखने को तैयार हूँ।3।

हे सखी! आ चल, हे सखी! आ चल। हम (चल के) प्रभू (के प्यार) को जगा दें, (आत्मिक) गुणों वाले मोहक गीत (कामिनी) गा के उस प्रभू-पति को वश में करें। ‘भगती से प्यार करने वाला’ (भगत वछल) – ये उसका नाम कहा जाता है। (हे सखी! आ) उसकी शरण पड़ जाएं, उसके दर पर गिर पड़ें।4।

हे सखी! जो जीव स्त्री खिमा वाले स्वभाव को अपने आत्मिक जीवन की सजावट बनाती है, जो अपने मन में गुरू से मिली आत्मिक जीवन की सूझ (का) दीपक जगाती है, प्रभू-पति उस पर प्रसन्न हो जाता है। प्रभू उसके आत्मिक मिलाप को बड़े ही आनंद से भोगता है। हे सहेली! मैं उस प्रभू-पति के आगे अपने प्राणों को बार-बार वारने को तैयार हूँ।5।

हे सखी! परमात्मा के नाम (की हरेक सांस में याद) की माला मैंने (अपने) गले में डाल ली है (याद की बरकति से सुंदर हो चुके अपने) मन को मैंने सबसे बढ़िया मोतीचूर गहना बना लिया है। हरी-नाम की श्रद्धा की मैंने (अपने हृदय में) सेज बिछा दी है, मेरे मन को वह प्रभू-पति बहुत प्यारा लग रहा है (अब तुझे विश्वास है कि) प्रभू-पति मुझे छोड़ के नहीं जा सकता।6।

हे सहेली! (अगर) प्रभू-पति कुछ और कहता रहे, और, (जीव-स्त्री) कुछ और करती रहे, तो (उस जीव-स्त्री का) सारा किया हुआ श्रृंगार (सारा धार्मिक उद्यम) व्यर्थ चला जाता है, बिल्कुल फोका बन जाता है। (उसके) मुँह पर तो थूकें ही पड़ीं, और प्रभू पति ने तो (किसी और) सोहागनि को अपनी बना लिया।7।

हे प्रभू! हम तेरी दासियाँ हैं तू अपहुँच और धरती का पति है। हम जीव-सि्त्रयां (तेरे आदेश के बाहर) कुछ नहीं कर सकती, हम तो सदा तेरे वश में हैं। हे नानक! (कह-) हे हरी! हम कंगालों पर मेहर कर, हमें अपने चरणों में रख, हमें गुरू के चरणों में जगह दिए रख।8।5।

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