बिलावलु महला ५ ॥
मनि तनि प्रभु आराधीऐ मिलि साध समागै ॥ उचरत गुन गोपाल जसु दूर ते जमु भागै ॥१॥ राम नामु जो जनु जपै अनदिनु सद जागै ॥ तंतु मंतु नह जोहई तितु चाखु न लागै ॥१॥ रहाउ ॥ काम क्रोध मद मान मोह बिनसे अनरागै ॥ आनंद मगन रसि राम रंगि नानक सरनागै ॥२॥४॥६८॥ {पन्ना 817-818}
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा का नाम जपता रहता है, वह हर वक्त सदा (विकारों से) सचेत रहता है। कोई जादू-टूणा उस पर असर नहीं कर सकता, कोई बुरी नजर उसको नहीं लग सकती।1। रहाउ।
हे भाई! साध-संगति में मिल के मन से हृदय से परमात्मा के नाम की आराधना करते रहना चाहिए। जगत के रक्षक प्रभू के गुण और यश उचारने से जम (भी) दूर से ही भाग जाता है।1।
हे नानक! जो मनुष्य परमात्मा के नाम के रस में टिका रहता है, प्रभू के प्रेम में मस्त रहता है, प्रभू की शरण पड़ा रहता है, वह सदा आत्मिक आनंद में मस्त रहता है। (उसके अंदर से) काम-क्रोध-अहंकार की मस्ती, मोह और और पदार्थों के चस्के सब नाश हो जाते हैं।2।4।68।



