Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar -6-4-26

सलोक मः ३ ॥
सेखा अंदरहु जोरु छडि तू भउ करि झलु गवाइ ॥ गुर कै भै केते निसतरे भै विचि निरभउ पाइ ॥ मनु कठोरु सबदि भेदि तूं सांति वसै मनि आइ ॥ सांती विचि कार कमावणी सा खसमु पाए थाइ ॥ नानक कामि क्रोधि किनै न पाइओ पुछहु गिआनी जाइ ॥१॥ मः ३ ॥ मनमुख माइआ मोहु है नामि न लगो पिआरु ॥ कूड़ु कमावै कूड़ु संग्रहै कूड़ु करे आहारु ॥ बिखु माइआ धनु संचि मरहि अंते होइ सभु छारु ॥ करम धरम सुच संजम करहि अंतरि लोभु विकारु ॥ नानक जि मनमुखु कमावै सु थाइ ना पवै दरगहि होइ खुआरु ॥२॥ पउड़ी ॥ आपे खाणी आपे बाणी आपे खंड वरभंड करे ॥ आपि समुंदु आपि है सागरु आपे ही विचि रतन धरे ॥ आपि लहाए करे जिसु किरपा जिस नो गुरमुखि करे हरे ॥ आपे भउजलु आपि है बोहिथा आपे खेवटु आपि तरे ॥ आपे करे कराए करता अवरु न दूजा तुझै सरे ॥९॥ {पन्ना 552}

अर्थ: हे शेख! हृदय में से हठ त्याग दे, ये पागलपन दूर कर और सतिगुरू का डर हृदय में बसा (भाव, अदब में आ) सतिगुरू के अदब में रहके कितने ही पार हो गए, (कितनों ने ही) भय में रह के निर्भय प्रभू को पा लिया।

(हे शेख!) अपने कठोर मन को (मन, जो हठ के कारण कठोर है) सतिगुरू के शबद से भेद दे ता कि तेरे मन में शांति और ठंड आ के बसे। फिर इस में (भजन बंदगी वाली) जो कार करेगा, मालिक उसे कबूल करेगा। हे नानक! किसी ज्ञान वाले को जा के पूछ ले, काम और क्रोध (आदि विकारों) के अधीन होने से किसी को भी ईश्वर नहीं मिलता।1।

मनमुख का माया में मोह है (इस करके) नाम में उसका प्यार नहीं बनता, वह (माया रूपी) झूठ कमाता, झूठ एकत्र करता है और झूठ को ही अपनी खुराक बनाता है (भाव, जिंदगी का आसरा समझता है)। (मन के अधीन हुए मनुष्य) विष रूपी माया धन को इकट्ठा कर करके खपते मरते हैं, जबकि आखिर में वह सारा धन राख हो जाता है (भाव, राख की तरह व्यर्थ हो जाता है) वे अपनी और से (आत्मिक काम भी करते हैं) कर्म-धर्म-पवित्रता के साधन व और संयम (भी) करते हैं (पर) उनके हृदय में लोभ व विकार (ही) रहता है।

हे नानक! मन के अधीन हुआ मनुष्य जो कुछ (भी) करता है वह कबूल नहीं होता और प्रभू की हजूरी में वह ख्वार होता है।2।

प्रभू स्वयं ही खाणियां, बोलियां, खण्ड व ब्रहमण्ड बनाता है, स्वयं ही समुंद्र व सागर है और उसने स्वयं ही इस में (सिफत सालाह रूपी) रत्न छुपा के रखे हैं; जिस पर कृपा करता है और जिसको सतिगुरू के सन्मुख करता है, उसे स्वयं ही वह रत्न प्राप्त करवा देता है। प्रभू खुद ही (संसार) समुंद्र है, खुद ही जहाज है, स्वयं ही मल्लाह है और स्वयं ही तैरता है, स्वयं ही सब कुछ करता कराता है। हे प्रभू! तेरे जैसा दूसरा कोई नहीं।9।

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