वडहंसु महला ३ ॥
सुणिअहु कंत महेलीहो पिरु सेविहु सबदि वीचारि ॥ अवगणवंती पिरु न जाणई मुठी रोवै कंत विसारि ॥ रोवै कंत समालि सदा गुण सारि ना पिरु मरै न जाए ॥ गुरमुखि जाता सबदि पछाता साचै प्रेमि समाए ॥ जिनि अपणा पिरु नही जाता करम बिधाता कूड़ि मुठी कूड़िआरे ॥ सुणिअहु कंत महेलीहो पिरु सेविहु सबदि वीचारे ॥१॥ सभु जगु आपि उपाइओनु आवणु जाणु संसारा ॥ माइआ मोहु खुआइअनु मरि जमै वारो वारा ॥ मरि जमै वारो वारा वधहि बिकारा गिआन विहूणी मूठी ॥ बिनु सबदै पिरु न पाइओ जनमु गवाइओ रोवै अवगुणिआरी झूठी ॥ पिरु जगजीवनु किस नो रोईऐ रोवै कंतु विसारे ॥ सभु जगु आपि उपाइओनु आवणु जाणु संसारे ॥२॥ सो पिरु सचा सद ही साचा है ना ओहु मरै न जाए ॥ भूली फिरै धन इआणीआ रंड बैठी दूजै भाए ॥ रंड बैठी दूजै भाए माइआ मोहि दुखु पाए आव घटै तनु छीजै ॥ जो किछु आइआ सभु किछु जासी दुखु लागा भाइ दूजै ॥ जमकालु न सूझै माइआ जगु लूझै लबि लोभि चितु लाए ॥ सो पिरु साचा सद ही साचा ना ओहु मरै न जाए ॥३॥ इकि रोवहि पिरहि विछुंनीआ अंधी ना जाणै पिरु नाले ॥ गुर परसादी साचा पिरु मिलै अंतरि सदा समाले ॥ पिरु अंतरि समाले सदा है नाले मनमुखि जाता दूरे ॥ इहु तनु रुलै रुलाइआ कामि न आइआ जिनि खसमु न जाता हदूरे ॥ नानक सा धन मिलै मिलाई पिरु अंतरि सदा समाले ॥ इकि रोवहि पिरहि विछुंनीआ अंधी न जाणै पिरु है नाले ॥४॥२॥
अर्थ: हे प्रभू-पति की जीव सि्त्रयो! (मेरी बात) सुन लेनी (वह ये है कि) गुरू शबद के द्वारा प्रभू के गुणों पर विचार करके प्रभू-पति की सेवा-भक्ति किया करो। जो जीव-स्त्री प्रभू-पति के साथ गहरी सांझ नहीं डालती, वह अवगुणों से भरी रहती है, प्रभू-पति को भुला के वह आत्मिक जीवन लुटा बैठती है, और, दुखी होती है। पर, जो जीव-स्त्री पति को हृदय में बसा के प्रभू के गुण सदा याद कर कर के (प्रभू के दर पर सदा) आरजू करती रहती है, उसका पति (-प्रभू) कभी मरता नहीं, उसे कभी छोड़ के नहीं जाता।
जो जीव-स्त्री गुरू की शरण पड़ कर प्रभू के साथ गहरी सांझ बना लेती है, गुरू के शबद के माध्यम से प्रभू के साथ जान-पहचान बनाती है, वह सदा कायम रहने वाले प्रभू के प्रेम में लीन रहती है। जिस जीव-स्त्री ने अपने उस प्रभू-पति के साथ सांझ नहीं बनाई जो सब जीवों को उनके कर्मों के अनुसार पैदा करने वाला है, उस झूठ की बंजारन को माया का मोह ठॅगे रखता है (इस वास्ते) हे प्रभू-पति की जीव-सि्त्रयो! (मेरी विनती) सुन लेनी- गुरू शबद के द्वारा प्रभू के गुणों की विचार करके प्रभू की सेवा-भक्ति किया करो।1।
हे भाई! सारा जगत और जगत का जनम मरण परमात्मा ने खुद बनाया है। माया का मोह (पैदा करके इस मोह में जगत को परमात्मा ने) आप ही भुलाया हुआ है (तभी तो) बार बार पैदा होता मरता रहता है। (माया के मोह में फस के जीव) बार बार पैदा होता मरता रहता है, (इसमें) विकार बढ़ते रहते हैं। आत्मिक जीवन की सूझ से वंचित दुनिया आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी लुटा बैठती है। गुरू के शबद के बिना जीव-स्त्री प्रभू-पति का मिलाप हासिल नहीं कर सकती। अपना जन्म व्यर्थ गवा लेती है; अवगुणों से भरी हुई, और झूठे मोह में फसी हुई दुखी होती रहती है।
पर, हे भाई! प्रभू खुद ही जगत का जीवन (-आधार) है, किसी की आत्मिक मौत मरने पर रोना भी क्या हुआ? (जीव-स्त्री) प्रभू-पति को भुला के दुखी होती रहती है। हे भाई! सारे जगत को प्रभू ने खुद ही पैदा किया है, जगत का जनम-मरण भी प्रभू ने खुद ही बनाया है।2।
हे भाई! वह प्रभू-पति सदा जीवित है, सदा ही जीता है, वह ना मरता है ना पैदा होता है। अंजान जीव-स्त्री उससे वंचित हुई फिरती है, माया के मोह में फंस के प्रभू से विछुड़ी रहती है। औरों के प्यार के कारण प्रभू से विछुड़ी रहती है, माया के मोह में फंस के दुख सहती है, (इस मोह में इसकी) उम्र गुजरती जाती है, और, शरीर कमजोर होता जाता है। (जगत का नियम तो है ही ये कि) जो कुछ यहाँ पैदा हुआ है वह सब कुछ नाश हो जाता है, पर माया के मोह के कारण (इस अॅटल नियम को भुला के जीव को किसी के मरने पर) दुख होता है। जगत (सदैव) माया की खातिर लड़ता-झगड़ता है, उसको (सिर पर) मौत नहीं सूझती, लब में लोभ में चिक्त लगाए रखता है।
हे भाई! वह प्रभू-पति सदा जीता है, सदा ही जीवित है, वह ना मरता है ना पैदा होता है।3।
कई जीव-सि्त्रयां ऐसी हैं जो प्रभू-पति से विछुड़ के दुखी रहती हैं। माया के मोह में अंधी हुई जीव स्त्री ये नहीं समझती कि प्रभू-पति हर वक्त साथ बसता है। गुरू की कृपा से जो जीव स्त्री प्रभू-पति को सदा अपने हृदय में बसाए रखती है, उसे सदा जीता-जागता प्रभू मिल जाता है, वह जीव-स्त्री सदा प्रभू-पति को अपने दिल में बसाए रखती है उसको वह सदा अंग-संग दिखाई देता है। पर, अपने मन के पीछे चलने वाली प्रभू को दूर बसता समझती है। हे भाई! जिस जीव-स्त्री ने प्रभू-पति को अंग-संग बसता नहीं समझा, उसका ये शरीर (विकारों में) बेकार होता रहता है, और किसी काम नहीं आता। हे नानक! जो जीव स्त्री (गुरू की कृपा से) प्रभू-पति को सदा अपने हृदय में बसाए रखती है, वह (गुरू की) मिलाई हुई प्रभू से मिल जाती है।
कई जीव-सि्त्रयां ऐसी हैं जो प्रभू-पति से विछुड़ के दुख पाती हैं। माया के मोह में अंधी हो चुकी जीव-स्त्री ये नहीं समझती कि प्रभू-पति हर वक्त साथ बसता है।4।2।



