Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar -23-3-26

सूही महला ५ ॥
उमकिओ हीउ मिलन प्रभ ताई ॥ खोजत चरिओ देखउ प्रिअ जाई ॥ सुनत सदेसरो प्रिअ ग्रिहि सेज विछाई ॥ भ्रमि भ्रमि आइओ तउ नदरि न पाई ॥१॥ किन बिधि हीअरो धीरै निमानो ॥ मिलु साजन हउ तुझु कुरबानो ॥१॥ रहाउ ॥ एका सेज विछी धन कंता ॥ धन सूती पिरु सद जागंता ॥ पीओ मदरो धन मतवंता ॥ धन जागै जे पिरु बोलंता ॥२॥ भई निरासी बहुतु दिन लागे ॥ देस दिसंतर मै सगले झागे ॥ खिनु रहनु न पावउ बिनु पग पागे ॥ होइ क्रिपालु प्रभ मिलह सभागे ॥३॥ भइओ क्रिपालु सतसंगि मिलाइआ ॥ बूझी तपति घरहि पिरु पाइआ ॥ सगल सीगार हुणि मुझहि सुहाइआ ॥ कहु नानक गुरि भरमु चुकाइआ ॥४॥ जह देखा तह पिरु है भाई ॥ खोल्हिओ कपाटु ता मनु ठहराई ॥१॥ रहाउ दूजा ॥५॥ {पन्ना 737-738}

अर्थ: हे सज्जन प्रभू! (मुझे) मिल, मैं तुझसे सदके जाती हूँ। (तेरे दर्शनों के बिना) मेरा ये निमाणा दिल कैसे धीरज धरे?।1। रहाउ।

हे सखी! प्यारे का सनेहा सुन के मैंने हृदय-गृह की सेज बिछा दी। मेरा हृदय प्रभू के मिलने के लिए खुशी से नाच उठा, (प्रभू को) तलाशने चढ़ पड़ा (कि) मैं प्यारे के रहने वाली जगह (कहीं) देख लूँ। (पर) भटक-भटक के वापस आ गया, तब (प्रभू की मेहर की) निगाह हासिल ना हुई।1।

हे सखी! जीव-स्त्री और प्रभू-पति की एक ही सेज (जीव-स्त्री के दिल में) बिछी हुई है; पर जीव स्त्री (सदा माया के मोह की नींद में) सोई रहती है, प्रभू-पति सदा जागता रहता है (माया के प्रभाव से ऊपर रहता है) जीव-स्त्री यूँ मस्त रहती है जैसे इसने शराब पी हुई हो। (हाँ) जीव स्त्री जाग भी सकती है, अगर प्रभू-पति खुद जगाए।2।

हे सखी! (उम्र के) बहुत सारे दिन बीत गए हैं, में (बाहर) और और सारे देश तलाश के देख लिए हैं (पर बाहर प्रभू-पति कहीं नहीं मिला। अब) मैं (बाहर ढूँढ-ढूँढ के) निराश हो गई हूँ। उस प्रभू-पति के चरणों में पड़े बिना मुझे एक छिन के लिए भी शांति प्राप्त नहीं होती। (हाँ, हे सखी!) अगर वह खुद दयावान हो, तो ही जीव-सि्त्रयों के सौभाग्य जागने से उस प्रभू को मिल सकती हैं।3।

हे नानक! कह–प्रभू मेरे पर दयावान हो गया है। मुझे उसने सत्संग में मिला दिया है। मेरी (विकारों की) तपश मिट गई है, मैंने उस पति-प्रभू को हृदय-गृह में ही पा लिया है। अब मुझे (अपने) सारे श्रंृगार (उद्यम) सुंदर लग रहे हैं। गुरू ने मेरी भटकना दूर कर दी है।4।

हे भाई! (गुरू ने मेरे अंदर से) भ्रम का पर्दा उतार दिया है, मेरा मन टिक गया है। अब मैं जिधर देखता हूँ, मुझे प्रभू ही दिखता है।1। रहाउ दूजा।5।

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