Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar -9-3-26

सूही महला ३ ॥

जे लोड़हि वरु बालड़ीए ता गुर चरणी चितु लाए राम ॥ सदा होवहि सोहागणी हरि जीउ मरै न जाए राम ॥ हरि जीउ मरै न जाए गुर कै सहजि सुभाए सा धन कंत पिआरी ॥ सचि संजमि सदा है निरमल गुर कै सबदि सीगारी ॥ मेरा प्रभु साचा सद ही साचा जिनि आपे आपु उपाइआ ॥ नानक सदा पिरु रावे आपणा जिनि गुर चरणी चितु लाइआ ॥१॥

अर्थ: हे अंजान जीव-स्त्री! अगर तू प्रभु पति का मिलाप चाहती है, तो अपने गुरु के चरणों में चिक्त जोड़ के रख। तू सदा के लिए सोहाग-भाग वाली बन जाएगी, (क्योंकि) प्रभु-पति ना कभी मरता है ना कभी नाश होता है। जो जीव-स्त्री गुरु के द्वारा आत्मिक अडोलता में प्रेम में लीन रहती है, वह पति-प्रभु को प्यारी लगती है। सदा-स्थिर प्रभु में जुड़ के, (विकारों पर) संयम रख के, वह जीव-स्त्री पवित्र जीवन वाली हो जाती है, गुरु के शब्द की इनायत से वह अपने आत्मिक जीवन को सुंदर बना लेती है। हे सहेलिए! मेरा प्रभु सदा कायम रहने वाला है, उसने अपने आप को आप ही प्रकट किया हुआ है। हे नानक! जिस जीव-स्त्री ने गुरु के चरणों में अपना मन जोड़ लिया, वह सदा प्रभु पति के मिलाप का आनंद भोगती है।1।

पिरु पाइअड़ा बालड़ीए अनदिनु सहजे माती राम ॥ गुरमती मनि अनदु भइआ तितु तनि मैलु न राती राम ॥ तितु तनि मैलु न राती हरि प्रभि राती मेरा प्रभु मेलि मिलाए ॥ अनदिनु रावे हरि प्रभु अपणा विचहु आपु गवाए ॥ गुरमति पाइआ सहजि मिलाइआ अपणे प्रीतम राती ॥ नानक नामु मिलै वडिआई प्रभु रावे रंगि राती ॥२॥

अर्थ: हे अंजान जीव-स्त्री! जो जीव-स्त्री प्रभु-पति का मिलाप हासिल कर लेती है, वह हर वक्त आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है। गुरु की मति के सदका उसके मन में आनंद बना रहता है, (उसके) शरीर में (विचारों की) रक्ती भर भी मैल नहीं होती। (उसके) शरीर में रक्ती भर भी मैल नहीं होती, वह प्रभु (के प्रेम-रंग में) रंगी रहती है प्रभु उसको अपने चरणों में मिला लेता है। वह जीव-स्त्री अपने अंदर से स्वै भाव दूर करके हर वक्त अपने हरि-प्रभु को सिमरती रहती है। गुरु की शिक्षा के साथ प्रभु से मिल जाती है, गुरु उसको आत्मिक अडोलता में टिका देता है, वह अपने प्रभु-प्रीतम के रंग में रंगी जाती है। हे नानक! उसको हरि-नाम मिल जाता है, इज्जत मिल जाती है, वह प्रेम-रंग में रंगी हुई हर वक्त प्रभु का स्मरण करती है।2।

पिरु रावे रंगि रातड़ीए पिर का महलु तिन पाइआ राम ॥ सो सहो अति निरमलु दाता जिनि विचहु आपु गवाइआ राम ॥ विचहु मोहु चुकाइआ जा हरि भाइआ हरि कामणि मनि भाणी ॥ अनदिनु गुण गावै नित साचे कथे अकथ कहाणी ॥ जुग चारे साचा एको वरतै बिनु गुर किनै न पाइआ ॥ नानक रंगि रवै रंगि राती जिनि हरि सेती चितु लाइआ ॥३॥

अर्थ: हे प्रभु के प्रेम-रंग में रंगी हुई जीव-स्त्री! जो जीव-स्त्री प्रभु-पति को हर वक्त सिमरती है, जिसने अपने अंदर से स्वैभाव दूर कर दिया है, उसने उस प्रभु की हजूरी प्राप्त कर ली है जो बहुत पवित्र है, और, सबको दातें देने वाला है।

जब प्रभु की रजा होती है, तब जीव-स्त्री अपने अंदर से मोह दूर करती है, और, प्रभु के मन को प्यारी लगने लगती है। फिर वह हर वक्त सदा-स्थिर प्रभु के गुण गाती रहती है, और उस प्रभु की महिमा की बातें करती है जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।

हे सखिए! चारों युगों में वह सदा-स्थिर प्रभु खुद ही अपना हुक्म बरता रहा है, पर गुरु की शरण के बिना किसी ने भी उसका मिलाप हासिल नहीं किया। हे नानक! जिस जीव-स्त्री ने परमात्मा से अपना मन जोड़ लिया, वह उसके प्रेम-रंग में रंगी हुई उसके प्रेम में उसका स्मरण करती है।3।

कामणि मनि सोहिलड़ा साजन मिले पिआरे राम ॥ गुरमती मनु निरमलु होआ हरि राखिआ उरि धारे राम ॥ हरि राखिआ उरि धारे अपना कारजु सवारे गुरमती हरि जाता ॥ प्रीतमि मोहि लइआ मनु मेरा पाइआ करम बिधाता ॥ सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ हरि वसिआ मंनि मुरारे ॥ नानक मेलि लई गुरि अपुनै गुर कै सबदि सवारे ॥४॥५॥६॥

अर्थ: जिस जीव-स्त्री को प्यारे सज्जन प्रभु जी मिल जाते हैं, उसके मन में आनंद बना रहता है। गुरु की मति पर चल कर उसका मन पवित्र हो जाता है, वह अपने दिल में हरि-प्रभु को टिकाए रखती है। वह जीव-स्त्री परमात्मा को अपने हृदय में बसाए रखती है, इस तरह अपने जीवन के उद्देश्य को सँवार लेती है, गुरु की शिक्षा की इनायत से वह परमात्मा के साथ गहरी सांझ बना लेती है। उसका मन, जो पहले ममता में फसा हुआ था, प्रीतम प्रभु ने अपने बस में कर लिया, और, उस जीव-स्त्री ने सदा आत्मिक आनंद पाया है, मुरारी प्रभु उस के मन में आ बसा है। हे नानक! गुरु के शब्द की इनायत से उस जीव-स्त्री ने अपना जीवन सुंदर बना लिया है, प्यारे गुरु ने उसको प्रभु-चरणों में जोड़ दिया है।4।5।6।

 

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