जैतसरी महला ५ छंत घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सलोक ॥
दरसन पिआसी दिनसु राति चितवउ अनदिनु नीत ॥ खोल्हि कपट गुरि मेलीआ नानक हरि संगि मीत ॥१॥ छंत ॥ सुणि यार हमारे सजण इक करउ बेनंतीआ ॥ तिसु मोहन लाल पिआरे हउ फिरउ खोजंतीआ ॥ तिसु दसि पिआरे सिरु धरी उतारे इक भोरी दरसनु दीजै ॥ नैन हमारे प्रिअ रंग रंगारे इकु तिलु भी ना धीरीजै ॥ प्रभ सिउ मनु लीना जिउ जल मीना चात्रिक जिवै तिसंतीआ ॥ जन नानक गुरु पूरा पाइआ सगली तिखा बुझंतीआ ॥१॥ यार वे प्रिअ हभे सखीआ मू कही न जेहीआ ॥ यार वे हिक डूं हिकि चाड़ै हउ किसु चितेहीआ ॥ हिक दूं हिकि चाड़े अनिक पिआरे नित करदे भोग बिलासा ॥ तिना देखि मनि चाउ उठंदा हउ कदि पाई गुणतासा ॥ जिनी मैडा लालु रीझाइआ हउ तिसु आगै मनु डेंहीआ ॥ नानकु कहै सुणि बिनउ सुहागणि मू दसि डिखा पिरु केहीआ ॥२॥ यार वे पिरु आपण भाणा किछु नीसी छंदा ॥ यार वे तै राविआ लालनु मू दसि दसंदा ॥ लालनु तै पाइआ आपु गवाइआ जै धन भाग मथाणे ॥ बांह पकड़ि ठाकुरि हउ घिधी गुण अवगण न पछाणे ॥ गुण हारु तै पाइआ रंगु लालु बणाइआ तिसु हभो किछु सुहंदा ॥ जन नानक धंनि सुहागणि साई जिसु संगि भतारु वसंदा ॥३॥ यार वे नित सुख सुखेदी सा मै पाई ॥ वरु लोड़ीदा आइआ वजी वाधाई ॥ महा मंगलु रहसु थीआ पिरु दइआलु सद नव रंगीआ ॥ वड भागि पाइआ गुरि मिलाइआ साध कै सतसंगीआ ॥ आसा मनसा सगल पूरी प्रिअ अंकि अंकु मिलाई ॥ बिनवंति नानकु सुख सुखेदी सा मै गुर मिलि पाई ॥४॥१॥ {पन्ना 703}
अर्थ: मुझे मित्र प्रभू के दर्शनों की तांघ लगी हुई है, मैं दिन-रात हर वक्त सदा ही (उसके दर्शन ही) चितारती रहती हूँ। हे नानक! (कह–) गुरू ने (मेरे) माया के जाल को काट के मुझे मित्र हरी से मिला दिया है।1।
छंत। हे मेरे सत्संगी मित्र! हे मेरे सज्जन! मैं (तेरे आगे) एक आरजू करती हूँ! मैं उस मन को मोह लेने वाले प्यारे लाल को तलाशती फिरती हूँ। (हे मित्र!) मुझे उस प्यारे के बारे में बता, मैं (उसके आगे अपना) सर उतार के रख दूंगी (और कहूँगी – हे प्यारे!) पल भर के लिए हमें भी दर्शन दे (हे गुरू!) मेरी आँखें प्यारे के प्रेम रंग में रंगी गई हैं (उसके दर्शनों के बिना) मुझे रक्ती भर समय के लिए भी चैन नहीं आता। मेरा मन प्रभू के साथ मस्त है जैसे पानी की मछली (पानी में मस्त रहती है), वैसे ही पपीहें को (बरखा की बूँद की) प्यास लगी रहती है।
हे दास नानक! (कह– जिस भाग्यशाली को) पूरा गुरू मिल जाता है (उसके दर्शनों की) सारी प्यास बुझ जाती है।
हे सत्संगी सज्जन! सारी सहेलियां प्यारे प्रभू की (सि्त्रयां) हैं, मैं (इन में से) किसी जैसी भी नहीं। ये एक से एक सुंदर (सुंदर आत्मिक जीवन वाली) हैं। मैं किस गिनती में हूँ? प्रभू से अनेकों ही प्यार करने वाले हैं, एक-दूसरे से बढ़िया जीवन वाले हैं, सदा प्रभू से आत्मिक मिलाप का आनंद लेते हैं। इनको देख के मेरे मन में भी चाव पैदा होता है कि मैं भी कभी उस गुणों के खजाने प्रभू को मिल सकूँ। (हे गुरू!) जिसने (ही) मेरे प्यारे हरी को प्रसन्न कर लिया है, मैं उसके आगे अपना मन भेटा करने को तैयार हूँ।
नानक कहता है– हे सोहागवंती! मेरी विनती सुन! मुझे बता, मैं देखूँ, प्रभू-पति कैसा है।2।
हे सत्संगी सज्जन! (जिस जीव-स्त्री को) अपना प्रभू-पति प्यारा लगने लग जाता है (उसे किसी की) कोई मुथाजी नहीं रह जाती। हे सत्संगी सज्जन! तूने सोहाने प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया है, मैं पूछता हूँ, मुझे भी उसके बारे में बता। तूने सोहणे लाल को ढूँढ लिया है, और (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लिया है। जिस जीव-स्त्री के माथे के भाग्य जागते हैं (उसे मिलाप होता है)। (हे सखी!) मालिक प्रभू ने (मेरी भी) बाँह पकड़ के मुझे अपनी बना लिया है, मेरा कोई गुण-अवगुण उसने नहीं परखा। हे दास नानक! (कह–) वह जीव-स्त्री भाग्यशाली है, जिसके साथ (जिसके हृदय में) पति-प्रभू बसता है।3।
हे सत्संगी सज्जन! जो सुख की मन्नतें सदा मैं मनाती रहती थी, वह (सुखना, मुराद) मेरी पूरी हो गई है। जिस प्रभू-पति को मैं (चिरों से) ढूँढती आ रही थी वह (मेरे हृदय में) आ बसा है, अब मेरे अंदर आत्मिक उत्साह के बाजे बज रहे हैं। सदा नए प्रेम-रंग वाला और दया का सोमा प्रभू-पति (मेरे अंदर आ बसा है, अब मेरे अंदर) बड़ा आनंद और उत्साह बन रहा है। हे सत्संगी सज्जन! बड़ी किस्मत से वह प्रभू-पति मुझे मिला है, गुरू ने मुझे साध-संगति में (उससे) मिला दिया है। (गुरू ने) मेरा स्वै प्यारे के अंक में मिला दिया है, मेरी हरेक आस-मुराद पूरी हो गई है।
नानक विनती करता है–जो सुखना (सुख की मन्नत) मैं सुखती रहती थी, गुरू को मिल के वह (मुराद) मैंने हासिल कर ली है।4।



