सलोक मः ५ ॥
लगड़ी सुथानि जोड़णहारै जोड़ीआ ॥ नानक लहरी लख सै आन डुबण देइ न मा पिरी ॥१॥ मः ५ ॥ बनि भीहावलै हिकु साथी लधमु दुख हरता हरि नामा ॥ बलि बलि जाई संत पिआरे नानक पूरन कामां ॥२॥ पउड़ी ॥ पाईअनि सभि निधान तेरै रंगि रतिआ ॥ न होवी पछोताउ तुध नो जपतिआ ॥ पहुचि न सकै कोइ तेरी टेक जन ॥ गुर पूरे वाहु वाहु सुख लहा चितारि मन ॥ गुर पहि सिफति भंडारु करमी पाईऐ ॥ सतिगुर नदरि निहाल बहुड़ि न धाईऐ ॥ रखै आपि दइआलु करि दासा आपणे ॥ हरि हरि हरि हरि नामु जीवा सुणि सुणे ॥७॥ {पन्ना 519}
अर्थ: (मेरी प्रीत) अच्छे ठिकाने पर (भाव, प्यारे प्रभू के चरणों में) अच्छी तरह लग गई है जोड़नहार प्रभू ने खुद जोड़ी है, (जगत में) सैकड़ों और लाखों और और ही (विकारों की) लहरें चल रही हैं। पर, हे नानक! मेरा प्यारा (मुझे इन लहरों में) डूबने नहीं देता।1।
(संसार रूपी इस) डरावने जंगल में मुझे हरि नाम रूप एक ही साथी मिला है जो दुखों का नाश करने वाला है। हे नानक! मैं प्यारे गुरू से सदके हूँ (जिसकी मेहर से मेरा ये) काम सिरे चढ़ा है।2।
(हे प्रभू!) अगर तेरे (प्यार के) रंग में रंगे जाएं तो, मानो, सारे खजाने मिल जाते हैं; तुझे सिमरते हुए (किसी बात से) पछताना नहीं पड़ता (भाव, कोई ऐसा बुरा काम नहीं कर सकते जिस कारण पछताना पड़े) जिन सेवकों को तेरा आसरा होता है उनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। पर, हे मन! पूरे गुरू को शाबाश (कह, जिसके द्वारा ‘नाम’) सिमर के सुख मिलता है। सिफत सालाह का खजाना सतिगुरू के पास ही है, मिलता है परमात्मा की कृपा से। अगर सतिगुरू मेहर की नजर से देखे तो बारंबार नहीं भटकते।
दया का घर प्रभू खुद अपने सेवक बना के (इस भटकना से) बचाता है, मैं भी उस प्रभू का नाम सुन सुन के जी रहा हूँ।7।



