Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar -14-2-26

ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु
अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥

रागु सूही महला १ चउपदे घरु १

भांडा धोइ बैसि धूपु देवहु तउ दूधै कउ जावहु ॥ दूधु करम फुनि सुरति समाइणु होइ निरास जमावहु ॥१॥ जपहु त एको नामा ॥ अवरि निराफल कामा ॥१॥ रहाउ ॥ इहु मनु ईटी हाथि करहु फुनि नेत्रउ नीद न आवै ॥ रसना नामु जपहु तब मथीऐ इन बिधि अम्रितु पावहु ॥२॥ मनु स्मपटु जितु सत सरि नावणु भावन पाती त्रिपति करे ॥ पूजा प्राण सेवकु जे सेवे इन्ह बिधि साहिबु रवतु रहै ॥३॥ कहदे कहहि कहे कहि जावहि तुम सरि अवरु न कोई ॥ भगति हीणु नानकु जनु ज्मपै हउ सालाही सचा सोई ॥४॥१॥ {पन्ना 728}

नोट: चउपदे–चार पदों वाले, चार बंदों वाले शबद।

नोट: इस शबद में दो अलंकार दिए हुए हैं–दूध मथने का और मूर्ति को पूजने का। बर्तन धो के माँज के उसमें दूध डालते हैं और जाग लगाई जाती है। नेत्रे की ईटियाँ (मथानी की डोर के सिरे को) हाथ में पकड़ के दूध बर्तन में मथते हैं और मक्खन निकाला जाता है।

ठाकुरों की मूर्ति (देवताओं की मूर्ति) को डब्बे में डाल के रखा जाता है, स्नान कराया जाता है, फूल–पत्ते आदि भेट करके पूजा की जाती है।

अर्थ: (हे भाई! अगर प्रभू को प्रसन्न करना है) तो सिर्फ प्रभू का नाम ही जपो (सिमरन छोड़ के प्रभू को प्रसन्न करने के) और सारे उद्यम व्यर्थ हैं।1। रहाउ।

(मक्खन हासिल करने के लिए हे भाई!) तुम (पहले) बर्तन धो के बैठ के (उस बर्तन को) धूप में धो के तब दूध लेने जाते हो (फिर जाग लगा के उसको जमाते हो। इसी तरह यदि हरी-नाम प्राप्त करना है, तो) हृदय को पवित्र करके मन को रोको – ये इस हृदय-बर्तन को धूप दो। तब दूध लेने जाओ। रोजाना की किरत-कार दूध है, प्रभू-चरनों में (हर वक्त) सुरति जोड़े रखनी (रोजाना के किरत-कार में) जाग लगाना है, (जुड़ी सुरति की बरकति से) दुनिया की आशाओं से ऊपर उठो, इस तरह ये दूध जमाओ (भाव, जुड़ी हुई सुरति की सहायता से रोजाना काम-काज करते हुए भी माया की ओर से उपरामता ही रहेगी)।1।

(दूध मथने के वक्त तुम नेत्रे की गिटियाँ हाथ में पकड़ते हो) अपने इस मन को वश में करो (आत्मिक जीवन के लिए इस तरह ये मन-रूप) गीटियाँ हाथ में पकड़ो। माया के मोह की नींद (मन पर) प्रभाव ना डाल सके- ये है नेत्रा। जीभ से परमात्मा का नाम जपो (ज्यों-ज्यों नाम जपोगे) त्यों-त्यों (ये रोजाना काम-काज रूपी दूध) मथता रहेगा, इन तरीकों से (रोजाना काम-काज करते हुए ही) नाम-अमृत प्राप्त कर लोगे।2।

(पुजारी मूर्ति को डिब्बे में डालता है, अगर जीव) अपने मन को डब्बा बनाए (उसमें परमात्मा का नाम टिका के रखे) उस नाम के द्वारा साध-संगति सरोवर में स्नान करे, (मन में टिके हुए प्रभू ठाकुर को) श्रद्धा के पत्रों से प्रसन्न करे, अगर जीव सेवक बन के स्वै भाव छोड़ के (अंदर बसते ठाकुर-प्रभू की) सेवा (सिमरन) करे, तो इन तरीकों से वह जीव मालिक प्रभू को सदा मिला रहता है।3।

(सिमरन के बिना प्रभू को प्रसन्न करने के अन्य उद्यम) बताने वाले लोग जो अन्य उद्यम बताते हैं, वे बता-बता के जीवन समय व्यर्थ गवा लेते हैं (क्योंकि) हे प्रभू! तेरे सिमरन जैसा और कोई उद्यम नहीं है। (चाहे) नानक (तेरा) दास भक्ति से वंचित (ही है फिर भी ये यही) विनती करता है कि मैं सदा कायम रहने वाले प्रभू की सदा सिफत-सालाह करता रहूँ।4।1।

धनासरी महला १ घरु १ चउपदे

ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु
अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥

जीउ डरतु है आपणा कै सिउ करी पुकार ॥ दूख विसारणु सेविआ सदा सदा दातारु ॥१॥ साहिबु मेरा नीत नवा सदा सदा दातारु ॥१॥ रहाउ ॥ अनदिनु साहिबु सेवीऐ अंति छडाए सोइ ॥ सुणि सुणि मेरी कामणी पारि उतारा होइ ॥२॥ दइआल तेरै नामि तरा ॥ सद कुरबाणै जाउ ॥१॥ रहाउ ॥ सरबं साचा एकु है दूजा नाही कोइ ॥ ता की सेवा सो करे जा कउ नदरि करे ॥३॥ तुधु बाझु पिआरे केव रहा ॥ सा वडिआई देहि जितु नामि तेरे लागि रहां ॥ दूजा नाही कोइ जिसु आगै पिआरे जाइ कहा ॥१॥ रहाउ ॥ सेवी साहिबु आपणा अवरु न जाचंउ कोइ ॥ नानकु ता का दासु है बिंद बिंद चुख चुख होइ ॥४॥ साहिब तेरे नाम विटहु बिंद बिंद चुख चुख होइ ॥१॥ रहाउ ॥४॥१॥ {पन्ना 660}

अर्थ: (जगत दुखों का समुंद्र है, इन दुखों को देख के) मेरी जीवात्मा काँपती है (परमात्मा के बिना और कोई बचाने वाला दिखाई नहीं देता) जिसके पास मैं मिन्नतें करूँ। (सो, अन्य आसरे छोड़ के) मैं दुखों के नाश करने वाले प्रभू को ही सिमरता हूँ, वह सदा ही बख्शिशें करने वाला है।1।

(फिर वह) मेरा मालिक सदा बख्शिशें करता रहता है (पर वह मेरी रोज के तरले सुन के उकताता नहीं, बख्शिशों में) नित्य यूँ है जैसे पहली बार ही बख्शिशें करने लगा है।1। रहाउ।

हे मेरी जिंदे! हर रोज उस मालिक को ही याद करना चाहिए (दुखों में से) आखिर वह ही बचाता है। हे जिंदे! ध्यान से सुन (उस मालिक का आसरा लेने से ही दुख के समुंद्र में से) पार लांघा जा सकता है।2।

हे दयालु प्रभू! मैं तुझसे सदा सदके जाता हूँ (मेहर कर, अपना नाम दे, ता कि) तेरे नाम के द्वारा मैं (दुखों के इस समुंद्र में से) पार लांघ सकूँ।1। रहाउ।

सदा कायम रहने वाला परमात्मा ही सब जगह मौजूद है, उसके बिना और कोई नहीं। जिस जीव पर वह मेहर की निगाह करता है, वह उसका सिमरन करता है।3।

हे प्यारे (प्रभू!) तेरी याद के बिना मैं व्याकुल हो जाता हूँ। मुझे वह कोई बड़ी दाति दे, जिस सदका मैं तेरे नाम में जुड़ा रहूँ। हे प्यारे! तेरे बिना और कोई ऐसा नहीं हैं, जिसके पास जा के मैं ये आरजू कर सकूँ।1। रहाउ।

(दुखों के इस सागर में से तैरने के लिए) मैं अपने मालिक प्रभू को ही याद करता हूँ, किसी और से मैं यह माँग नहीं माँगता। नानक (अपने) उस (मालिक) का ही सेवक है, उस मालिक से ही खिन खिन सदके होता है।4।

हे मेरे मालिक! मैं तेरे नाम से छिन-छिन कुर्बान जाता हूँ।1। रहाउ।

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