Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar -7-2-26

सलोकु मः ३ ॥
जि सतिगुरु सेवे आपणा तिस नो पूजे सभु कोइ ॥ सभना उपावा सिरि उपाउ है हरि नामु परापति होइ ॥ अंतरि सीतल साति वसै जपि हिरदै सदा सुखु होइ ॥ अम्रितु खाणा अम्रितु पैनणा नानक नामु वडाई होइ ॥१॥ मः ३ ॥ ए मन गुर की सिख सुणि हरि पावहि गुणी निधानु ॥ हरि सुखदाता मनि वसै हउमै जाइ गुमानु ॥ नानक नदरी पाईऐ ता अनदिनु लागै धिआनु ॥२॥ पउड़ी ॥ सतु संतोखु सभु सचु है गुरमुखि पविता ॥ अंदरहु कपटु विकारु गइआ मनु सहजे जिता ॥ तह जोति प्रगासु अनंद रसु अगिआनु गविता ॥ अनदिनु हरि के गुण रवै गुण परगटु किता ॥ सभना दाता एकु है इको हरि मिता ॥९॥ {पन्ना 511}

अर्थ: जो मनुष्य अपने गुरू के कहे पर चलता है, हरेक बंदा उसका आदर करता है, सो (जगत में भी सम्मान हासिल करने के लिए) सभी उपायों में बड़ा उपाय यही है कि प्रभू का नाम मिल जाए, ‘नाम’ जपने से हृदय में सुख होता है, मन में ठंड और शांति बसती है। (गुरू की आज्ञा में चल के ‘नाम’ जपने वाले बंदे की) खुराक और खुराक अमृत ही हो जाती है (भाव, प्रभू का नाम ही उसकी जिंदगी का आसरा हो जाता है) हे नानक! नाम ही उसके लिए आदर-मान है।1।

हे मेरे मन! सतिगुरू की शिक्षा सुन (भाव, शिक्षा पर चल) तुझे गुणों का खजाना प्रभू मिल जाएगा; सुखों का दाता परमात्मा मन में आ बसेगा, अहम्-अहंकार नाश हो जाएगा।

हे नानक! जब प्रभू अपनी मेहर की नजर से मिलता है तो हर वक्त सुरति उसमें जुड़ी रहती है।2।

जो मनुष्य गुरू का हो के रहता है वह पवित्र (जीवन वाला) हो जाता है, उसको सत-संतोष प्राप्त होता है, उसे हर जगह प्रभू दिखता है, उसके मन में से खोट विकार दूर हो जाते हैं, वह आसानी से ही मन को वश में कर लेता है; इस अवस्था में (पहुँच के उसके अंदर परमात्मा की) ज्योति का प्रकाश हो जाता है, आत्मिक आनंद की उसको चाट लग जाती है और अज्ञान दूर हो जाता है, (फिर) वह हर वक्त परमात्मा के गुण गाता है, (रॅबी) गुण उसके अंदर प्रकट हो जाते हैं; (उसे ये यकीन बन जाता है कि) एक प्रभू सारे जीवों का दाता है और मित्र है।9।

(नोट: अगले श्लोक और पउड़ी में ‘अनदिनु लागै धिआनु’ ‘अनदिनु हरि के गुण रवै’ तुकों के साथ यही भाव निकलता है कि ‘नाम’ उस मनुष्य का जीवन–आधार बन जाता है। सो यहाँ शब्द ‘अमृत’ के अर्थ ‘पवित्र’ करना मुनासिब नहीं है।)

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