Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar – 24-1-26

रागु सूही छंत महला १ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भरि जोबनि मै मत पेईअड़ै घरि पाहुणी बलि राम जीउ ॥ मैली अवगणि चिति बिनु गुर गुण न समावनी बलि राम जीउ ॥ गुण सार न जाणी भरमि भुलाणी जोबनु बादि गवाइआ ॥ वरु घरु दरु दरसनु नही जाता पिर का सहजु न भाइआ ॥ सतिगुर पूछि न मारगि चाली सूती रैणि विहाणी ॥ नानक बालतणि राडेपा बिनु पिर धन कुमलाणी ॥१॥ बाबा मै वरु देहि मै हरि वरु भावै तिस की बलि राम जीउ ॥ रवि रहिआ जुग चारि त्रिभवण बाणी जिस की बलि राम जीउ ॥ त्रिभवण कंतु रवै सोहागणि अवगणवंती दूरे ॥ जैसी आसा तैसी मनसा पूरि रहिआ भरपूरे ॥ हरि की नारि सु सरब सुहागणि रांड न मैलै वेसे ॥ नानक मै वरु साचा भावै जुगि जुगि प्रीतम तैसे ॥२॥ बाबा लगनु गणाइ हं भी वंञा साहुरै बलि राम जीउ ॥ साहा हुकमु रजाइ सो न टलै जो प्रभु करै बलि राम जीउ ॥ किरतु पइआ करतै करि पाइआ मेटि न सकै कोई ॥ जाञी नाउ नरह निहकेवलु रवि रहिआ तिहु लोई ॥ माइ निरासी रोइ विछुंनी बाली बालै हेते ॥ नानक साच सबदि सुख महली गुर चरणी प्रभु चेते ॥३॥ बाबुलि दितड़ी दूरि ना आवै घरि पेईऐ बलि राम जीउ ॥ रहसी वेखि हदूरि पिरि रावी घरि सोहीऐ बलि राम जीउ ॥ साचे पिर लोड़ी प्रीतम जोड़ी मति पूरी परधाने ॥ संजोगी मेला थानि सुहेला गुणवंती गुर गिआने ॥ सतु संतोखु सदा सचु पलै सचु बोलै पिर भाए ॥ नानक विछुड़ि ना दुखु पाए गुरमति अंकि समाए ॥४॥१॥ {पन्ना 763-764}

अर्थ: हे प्रभू जी! मैं तुझसे सदके हूँ (तूने कैसी आश्चर्यजनक लीला रचाई है!) जीव स्त्री (तेरी रची माया के प्रभाव तहत) जवानी के वक्त वह ऐसे मस्त है जैसे शराब पी के मदहोश है, (ये भी नहीं समझती कि) इस पेके घर में (इस जगत में) वह एक मेहमान ही है। विकारों की कमाई के कारण चिक्त से वह मैली रहती है (गुरू की शरण नहीं आती, और) गुरू (की शरण पड़े) बिना (हृदय में) गुण टिक नहीं सकते।

(माया की) भटकना में पड़ कर जीव-स्त्री ने (प्रभू के) गुणों की कीमत ना समझी, गलत रास्ते पर पड़ी रही, और जवानी का समय व्यर्थ गवा लिया। ना उसने पति-प्रभू के साथ सांझ डाली, ना उसके दर ना उसके घर और ना ही उसके दर्शनों की कद्र पहचानी। (भटकना में ही रह कर) जीव-स्त्री को प्रभू-पति का सुभाव भी पसंद नहीं आया।

माया के मोह में सोई हुई जीव-स्त्री की जिंदगी की सारी रात बीत गई, सतिगुरू की शिक्षा ले के ठीक रास्ते पर कभी ना चली। हे नानक! ऐसी जीव-स्त्री तो बाली उम्र में ही विधवा हो गई, और प्रभू-पति के मिलाप के बिना उसका हृदय-कमल कुम्हलाया ही रहा।1।

हे प्यारे सतिगुरू! मुझे पति-प्रभू मिला। (मेहर कर) मुझे वह पति-प्रभू प्यारा लगे, मैं उससे सदके जाऊँ, जो सदा ही हर जगह व्यापक है, तीनों ही भवनों में जिसका हुकम चल रहा है।

तीनों भवनों का मालिक प्रभू भाग्यशाली जीव-स्त्री से प्यार करता है, पर जिसने अवगुण ही अवगुण सहेड़ लिए वह उसके चरणों से विछुड़ी रहती है। वह मालिक हरेक के हृदय में व्यापक है (वह हरेक के दिल की जानता है) जैसी आस ले के कोई उसके दर पर आती है वैसी ही इच्छा वह पूरी कर देता है।

जो जीव-स्त्री प्रभू-पति की बनी रहती है वह सदा सोहाग-भाग वाली है, वह कभी विधवा नहीं होती, उसका वेश कभी मैला नहीं होता (उसका हृदय कभी विकारों से मैला नहीं होता)।

हे नानक! (अरदास कर और कह– हे सतिगुरू! तेरी मेहर हो तो) वह सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू-पति मुझे (हमेशा) प्यारा लगता रहे जो प्रीतम हरेक युग में एक समान रहने वाला है।2।

हे सतिगुरू! (वह) महूरत निकलवा (वह अवसर पैदा कर, जिसकी बरकति से) मैं भी पति-प्रभू के चरणों में जुड़ सकूँ। (हे गुरू! तेरी कृपा से) रजा का मालिक जो हुकम करता है वह मेल का अवसर बन जाता है, उसको कोई टाल नहीं सकता (उसमें कोई विघ्न नहीं डाल सकता)।

जीवों के किए कर्मों के अनुसार करतार ने (उनके मिलन व विछोड़े का) जो भी हुकम दिया है उसकी कोई उलंघ्ना नहीं कर सकता।

(गुरू विचोले की कृपा से) वह परमात्मा जो तीनों लोकों में व्यापक है और (फिर भी अपने पैदा किए) बंदों से स्वतंत्र है (जीव-स्त्री को अपने चरणों में जोड़ने के लिए) दूल्हा बन के आता है। (जैसे बेटी को विदा करती माँ दोबारा मिलने की उम्मीदें त्याग के रो के विछुड़ती है, वैसे ही) माया जीव-स्त्री के प्रभू-पति के साथ प्रेम के कारण जीव-स्त्री को अपने काबू में रख सकने की उम्मीदें छोड़ के (मानो) रो के विछुड़ती है।

हे नानक! जीव-स्त्री गुरू के चरणों की बरकति से प्रभू-पति को हृदय में बसाती है, और सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाले शबद के द्वारा प्रभू की हजूरी में आनंद पाती है।3।

सतिगुरू ने (मेहर करके जीव-स्त्री माया के प्रभाव से इतनी) दूर पहुँचा दी कि वह दोबारा जनम-मरण के चक्कर में नहीं आती। प्रभू-पति के प्रत्यक्ष दीदार करके वह प्रसन्न-चिक्त होती है। प्रभू-पति ने (जब) उससे प्यार किया, तो उसके चरणों में जुड़ के वह अपना आत्मिक जीवन सँवारती है।

सदा-स्थिर प्रीतम प्रभू को उस जीव-स्त्री की जरूरत पड़ी (भाव, जीव-स्त्री उसके लेखे में आ गई) उसने उसको अपने साथ मिला लिया। (इस मिलाप की बरकति से) उसकी मति त्रुटि-हीन हो गई, वह जानी पहचानी हस्ती बन गई। सौभाग्य से उसका मिलाप हो गया, प्रभू-चरणों में उसका जीवन सुखी हो गया, वह गुणवती हो गई, गुरू के दिए ज्ञान वाली हो गई।

सत्य-संतोष और सदा-स्थिर याद उसके हृदय में टिक जाती है, वह सदा-स्थिर प्रभू को सदा सिमरती है, वह प्रभू-पति को प्यारी लगने लग जाती है। हे नानक! जीव-स्त्री (प्रभू-चरणों से) विछुड़ के दुख नहीं पाती, गुरू की शिक्षा की बरकति से वह प्रभू की गोद में लीन हो जाती है।4।1।

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