बिलावलु महला ४ ॥
आवहु संत मिलहु मेरे भाई मिलि हरि हरि कथा करहु ॥ हरि हरि नामु बोहिथु है कलजुगि खेवटु गुर सबदि तरहु ॥१॥ मेरे मन हरि गुण हरि उचरहु ॥ मसतकि लिखत लिखे गुन गाए मिलि संगति पारि परहु ॥१॥ रहाउ ॥ काइआ नगर महि राम रसु ऊतमु किउ पाईऐ उपदेसु जन करहु ॥ सतिगुरु सेवि सफल हरि दरसनु मिलि अम्रितु हरि रसु पीअहु ॥२॥ हरि हरि नामु अम्रितु हरि मीठा हरि संतहु चाखि दिखहु ॥ गुरमति हरि रसु मीठा लागा तिन बिसरे सभि बिख रसहु ॥३॥ राम नामु रसु राम रसाइणु हरि सेवहु संत जनहु ॥ चारि पदारथ चारे पाए गुरमति नानक हरि भजहु ॥४॥४॥ {पन्ना 799-800}
अर्थ: हे मेरे मन! सदा परमात्मा के गुण याद करता रह। जिस मनुष्य के माथे पर लिखे अच्छे भाग्य जागते हैं वह प्रभू के गुण गाता है। (हे मन! तू भी) साध-संगति में मिल के (गुण गा और संसार-समुंद्र से) पार लांघ।1। रहाउ।
हे संतजनो! हे भाईयो! (साध-संगित में) एक साथ मिल के बैठो, और मिल के सदा प्रभू की सिफत सालाह की बातें करो। इस कलह भरे संसार में परमात्मा का नाम (जैसे) जहाज है, (गुरू इस जहाज का) मल्लाह (है, तुम) गुरू के शबद में जुड़ के (संसार-समुंद्र से) पार लांघो।1।
(शहरों में खाने-पीने के लिए कई किस्मों के स्वादिष्ट पदार्थ मिलते हैं। मनुष्य का) शरीर (भी, जैसे, एक शहर है, इस) शहर में परमात्मा का नाम (सब पदार्थों से) उक्तम स्वादिष्ट पदार्थ है। (पर) हे संतजनो! (मुझे) समझाओ कि ये कैसे हासिल हो। (संत जन यही बताते हैं कि गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा का (आत्मिक जीवन-) फल देने वाले दर्शन करो, गुरू को मिल के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीते रहो।2।
हे संतजनो! बेशक चख के देख लो, परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाला मीठा जल है। गुरू की शिक्षा पर चल के जिन मनुष्यों को यह नाम-रस स्वादिष्ट लगता है, आत्मिक जीवन को खत्म कर देने वाले और सारे रस उनको भूल जाते हैं।3।
हे संत जनो! परमात्मा का नाम स्वादिष्ट पदार्थ है, रसायन है, सदा इसका सेवन करते रहो (इसका प्रयोग हमेशा करते रहो)। हे नानक! (जगत में कुल) चार पदार्थ (गिने गए हैं, नाम-रसायन की बरकति से यह) चारों ही मिल जाते हैं। (इस वास्ते) गुरू की मति ले के हमेशा हरी-नाम का भजन करते रहो।4।4।



