रागु सूही महला ३ घरु १ असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नामै ही ते सभु किछु होआ बिनु सतिगुर नामु न जापै ॥ गुर का सबदु महा रसु मीठा बिनु चाखे सादु न जापै ॥ कउडी बदलै जनमु गवाइआ चीनसि नाही आपै ॥ गुरमुखि होवै ता एको जाणै हउमै दुखु न संतापै ॥१॥ बलिहारी गुर अपणे विटहु जिनि साचे सिउ लिव लाई ॥ सबदु चीन्हि आतमु परगासिआ सहजे रहिआ समाई ॥१॥ रहाउ ॥ गुरमुखि गावै गुरमुखि बूझै गुरमुखि सबदु बीचारे ॥ जीउ पिंडु सभु गुर ते उपजै गुरमुखि कारज सवारे ॥ मनमुखि अंधा अंधु कमावै बिखु खटे संसारे ॥ माइआ मोहि सदा दुखु पाए बिनु गुर अति पिआरे ॥२॥ सोई सेवकु जे सतिगुर सेवे चालै सतिगुर भाए ॥ साचा सबदु सिफति है साची साचा मंनि वसाए ॥ सची बाणी गुरमुखि आखै हउमै विचहु जाए ॥ आपे दाता करमु है साचा साचा सबदु सुणाए ॥३॥ गुरमुखि घाले गुरमुखि खटे गुरमुखि नामु जपाए ॥ सदा अलिपतु साचै रंगि राता गुर कै सहजि सुभाए ॥ मनमुखु सद ही कूड़ो बोलै बिखु बीजै बिखु खाए ॥ जमकालि बाधा त्रिसना दाधा बिनु गुर कवणु छडाए ॥४॥ सचा तीरथु जितु सत सरि नावणु गुरमुखि आपि बुझाए ॥ अठसठि तीरथ गुर सबदि दिखाए तितु नातै मलु जाए ॥ सचा सबदु सचा है निरमलु ना मलु लगै न लाए ॥ सची सिफति सची सालाह पूरे गुर ते पाए ॥५॥ तनु मनु सभु किछु हरि तिसु केरा दुरमति कहणु न जाए ॥ हुकमु होवै ता निरमलु होवै हउमै विचहु जाए ॥ गुर की साखी सहजे चाखी त्रिसना अगनि बुझाए ॥ गुर कै सबदि राता सहजे माता सहजे रहिआ समाए ॥६॥ हरि का नामु सति करि जाणै गुर कै भाइ पिआरे ॥ सची वडिआई गुर ते पाई सचै नाइ पिआरे ॥ एको सचा सभ महि वरतै विरला को वीचारे ॥ आपे मेलि लए ता बखसे सची भगति सवारे ॥७॥ सभो सचु सचु सचु वरतै गुरमुखि कोई जाणै ॥ जमण मरणा हुकमो वरतै गुरमुखि आपु पछाणै ॥ नामु धिआए ता सतिगुरु भाए जो इछै सो फलु पाए ॥ नानक तिस दा सभु किछु होवै जि विचहु आपु गवाए ॥८॥१॥ {पन्ना 753}
अर्थ: हे भाई! मैं अपने गुरू से सदके जाता हूँ, जिसने (शरण आए मनुष्य की) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के साथ प्रीति जोड़ दी (भाव, जोड़ देता है)। गुरू के शबद से सांझ डाल के मनुष्य का आत्मिक जीवन चमक उठता है, मनुष्य आत्मिक अडोलता में लीन रहता है।1। रहाउ।
हे भाई! परमात्मा के नाम से सब कुछ (सारा रौशन आत्मिक जीवन) होता है, पर गुरू की शरण पड़े बिना नाम की कद्र नहीं पड़ती। गुरू का शबद बड़े रस वाला है मीठा है, जब तक इसे चखा ना जाए, स्वाद का पता नहीं चल सकता। जो मनुष्य (गुरू के शबद के द्वारा) अपने आत्मिक जीवन को पहचानता नहीं, वह अपने मानस जन्म को कौड़ी के बदले (व्यर्थ ही) गवा लेता है। जब मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलता है, तब एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालता है, और, (तब) उसे अहंकार का दुख नहीं सता सकता।1।
हे भाई! गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य गुरू के शबद को गाता रहता है, गुरू के शबद को समझता है, गुरू के शबद को विचारता है। उस मनुष्य की जिंद उसका शरीर गुरू की बरकति से नया आत्मिक जन्म लेता है, गुरू की शरण पड़ कर वह अपने सारे काम सँवार लेता है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया के मोह में अंधा हुआ रहता है, वह सदैव अंधों वाला काम ही करता रहता है, जगत में वह वही कमाई करता है जो उसके आत्मिक जीवन के लिए जहर बन जाती है। प्यारे गुरू की शरण पड़े बिना वह मनुष्य माया के मोह में फंस के सदा दुख सहता रहता है।2।
जो मनुष्य गुरू की शरण आ पड़ता है, गुरू की रजा में चलने लग जाता है वह मनुष्य परमात्मा का भक्त बन जाता है। सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी, सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह (उसके मन में टिकी रहती है), वह मनुष्य सदा कायम रहने वाले मनुष्य को अपने मन में बसाए रखता है। गुरू के बताए हुए राह पर चलने वाला मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी उचारता रहता है (जिसकी बरकति से उसके) अंदर से अहंकार दूर हो जाती है। (उसे यकीन बन जाता है कि) परमात्मा स्वयं सब दातें देने वाला है, परमात्मा की बख्शिश अटॅल है। वह मनुष्य (औरों को भी) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह सुनाता रहता है।3।
हे भाई! जो मनुष्य गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलता है, वह (नाम सिमरन की) मेहनत करता है, (नाम-धन) कमाता है, और, (औरों को भी) नाम जपवाता है। सदा-स्थिर प्रभू के प्रेम रंग में रंगीज के वह मनुष्य सदैव (माया के मोह से) निर्लिप रहता है। गुरू के दर पर रह के वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिका रहता है, प्रभू के प्रेम में लीन रहता है।
पर, अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य सदा ही झूठ बोलता है, (आत्मिक जीवन के खत्म कर देने वाली माया के मोह का) जहर बीजता है, और वही जहर खाता है (उसी जहर को अपने जीवन का सहारा बनाए रखता है)। वह मनुष्य आत्मिक मौत की फाहियों में बँधा रहता है, तृष्णा की आग में जला रहता है। (इस बिपता में से उसको) गुरू के बिना और कोई नहीं छुड़ा सकता।4।
जो मनुष्य गुरू की शरण आ पड़ता है उसको प्रभू स्वयं ये सूझ बख्शता है कि जिस सच्चे सरोवर में स्नान करना चाहिए वह सदा कायम रहने वाला तीर्थ (गुरू का शबद ही है) गुरू के शबद में (ही उस प्रभू को) अढ़सठ तीर्थ दिखा देता है (और दिखा देता है कि) उस (गुरू-शबद-तीर्थ) में नहाने से (विकारों की) मैल उतर जाती है। (उस मनुष्य को यकीन बन जाता है कि) गुरू का शबद ही सदा कायम रहने वाला और पवित्र तीर्थ है (उसमें स्नान करने से विकारों की) मैल नहीं लगती, (वह तीर्थ और) मैल नहीं चिपकाता। वह मनुष्य पूरे गुरू के पास से सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा की सिफत-सालाह प्राप्त कर लेता है।5।
पर, जो मनुष्य गुरू की शरण नहीं पड़ता, वह (मनुष्य) खोटी मति के कारण ये नहीं कह सकता कि हमारा ये शरीर हमारा ये मन सब कुछ उस प्रभू का ही दिया हुआ है। जब परमात्मा की रजा होती है (मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है, उसका मन) पवित्र हो जाता है (उसके) अंदर से अहंकार दूर हो जाता है वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के गुरू के उपदेश का आनंद लेता है, (गुरू का उपदेश उसके अंदर से) तृष्णा की आग बुझा देता है। वह मनुष्य गुरू के शबद में रंगा जाता है, आत्मिक अडोलता में मस्त हो जाता है, आत्मिक अडोलता में ही लीन रहता है।6।
जो मनुष्य प्यारे गुरू के प्रेम में टिका रहता है, वह ये बात समझ लेता है कि परमात्मा का नाम ही सच्चा साथी है। वह मनुष्य परमात्मा की सदा-स्थिर रहने वाली सिफत सालाह गुरू से प्राप्त कर लेता है, वह सदा-स्थिर प्रभू के नाम में प्यार करने लग जाता है। कोई विरला मनुष्य (गुरू की शरण पड़ के) ये विचार करता है कि सारी सृष्टि में सदा-स्थिर रहने वाला परमात्मा ही बसता है। (ऐसे मनुष्य को) जब प्रभू स्वयं ही अपने चरणों में जोड़ता है, तो उस पर बख्शिश करता है, सदा-स्थिर रहने वाली अपनी भक्ति दे के उसका जीवन सोहाना बना देता है।7।
हे भाई! कोई विरला मनुष्य गुरू की शरण पड़ के समझता है कि हर जगह सदा कायम रहने वाला परमात्मा ही काम कर रहा है। जगत में पैदा होना मरना भी उसी के हुकम में चल रहा है। गुरू की शरण पड़ने वाला वह मनुष्य अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है। जब वह मनुष्य परमात्मा के नाम का सिमरन शुरू करता है तो वह गुरू को प्यारा लगने लग जाता है, फिर वह जो भी मुराद माँगता है वही हासिल कर लेता है। हे नानक! (कह–) जो मनुष्य (गुरू की शरण पड़ कर) अपने अंदर से स्वै भाव दूर कर लेता है, उसके आत्मिक जीवन का सारा सरमाया बचा रहता है।8।1।



