जैतसरी महला ४ ॥
जिन हरि हिरदै नामु न बसिओ तिन मात कीजै हरि बांझा ॥ तिन सुंञी देह फिरहि बिनु नावै ओइ खपि खपि मुए करांझा ॥१॥ मेरे मन जपि राम नामु हरि माझा ॥ हरि हरि क्रिपालि क्रिपा प्रभि धारी गुरि गिआनु दीओ मनु समझा ॥ रहाउ ॥ हरि कीरति कलजुगि पदु ऊतमु हरि पाईऐ सतिगुर माझा ॥ हउ बलिहारी सतिगुर अपुने जिनि गुपतु नामु परगाझा ॥२॥ दरसनु साध मिलिओ वडभागी सभि किलबिख गए गवाझा ॥ सतिगुरु साहु पाइआ वड दाणा हरि कीए बहु गुण साझा ॥३॥ जिन कउ क्रिपा करी जगजीवनि हरि उरि धारिओ मन माझा ॥ धरम राइ दरि कागद फारे जन नानक लेखा समझा ॥४॥५॥ {पन्ना 697}
अर्थ: हे मेरे मन! उस परमात्मा का नाम जपा कर, जो तेरे अंदर ही बस रहा है। हे भाई! कृपालु प्रभू ने (जिस मनुष्य पर) कृपा की उसको गुरू ने आत्मिक जीवन की सूझ बख्शी उसका मन (नाम जपने की महत्वता को) समझ गया। रहाउ।
हे भाई! जिन मनुष्यों के हृदय में परमात्मा का नाम नहीं बसता, उनकी माँ को हरी बाँझ ही कर दिया करे (तो ठीक है, क्योंकि) उनका शरीर हरी-नाम से सूना रहता है, वे नाम से वंचित ही घूमते फिरते हैं, वे चिंताओं, कुड़न में दुखी हो-हो के आत्मिक मौत सहेड़ते रहते हैं।1।
हे भाई! जगत में परमात्मा की सिफत-सालाह ही सबसे ऊँचा दर्जा है, (पर) परमात्मा गुरू के द्वारा (ही) मिलता है। हे भाई! मैं अपने गुरू से कुर्बान जाता हूँ जिसने मेरे अंदर ही छुपे हुए बसते परमात्मा का नाम प्रगट कर दिया।2।
हे भाई! जिस मनुष्य को बड़े भाग्यों से गुरू के दर्शन प्राप्त होते हैं, उसके सारे पाप दूर हो जाते हैं। जिसे बड़ा समझदार और शाह गुरू मिल गया, गुरू ने परमात्मा के बहुत सारे गुणों से उसको सांझीवाल बना दिया।3।
हे भाई! जगत के जीवन प्रभू ने जिन मनुष्यों पर कृपा की, उन्होंने अपने मन में हृदय में परमात्मा का नाम टिका लिया। हे नानक! (कह– हे भाई!) धर्मराज के दर पर उन मनुष्यों के (किए कर्मों के लेखे के सारे) कागज फाड़ दिए गए, उन दासों का लेखा निपट गया।4।5।



