सोरठि महला ५ घरु २ चउपदे ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
एकु पिता एकस के हम बारिक तू मेरा गुर हाई ॥ सुणि मीता जीउ हमारा बलि बलि जासी हरि दरसनु देहु दिखाई ॥१॥ सुणि मीता धूरी कउ बलि जाई ॥ इहु मनु तेरा भाई ॥ रहाउ ॥ पाव मलोवा मलि मलि धोवा इहु मनु तै कू देसा ॥ सुणि मीता हउ तेरी सरणाई आइआ प्रभ मिलउ देहु उपदेसा ॥२॥ मानु न कीजै सरणि परीजै करै सु भला मनाईऐ ॥ सुणि मीता जीउ पिंडु सभु तनु अरपीजै इउ दरसनु हरि जीउ पाईऐ ॥३॥ भइओ अनुग्रहु प्रसादि संतन कै हरि नामा है मीठा ॥ जन नानक कउ गुरि किरपा धारी सभु अकुल निरंजनु डीठा ॥४॥१॥१२॥ {पन्ना 612}
नोट: यहाँ से ‘घरु २’ के शबद शुरू होते हैं। पहले शबदों का संग्रह11 है।
अर्थ: हे मित्र! (मेरी विनती) सुन। मैं (तेरे चरणों की) धूड़ से कुर्बान जाता हूँ। हे भाई! (मैं अपना) ये मन तेरा (आज्ञाकारी बनाने को तैयार हूँ)। रहाउ।
हे मित्र! (हमारा) एक ही प्रभू पिता है, हम एक ही प्रभू-पिता के बच्चे हैं, (फिर,) तू मेरा गुरभाई (भी) है। मुझे परमात्मा के दर्शन करवा दे। मेरे प्राण तुझसे बारंबार सदके जाया करेंगे।1।
हे मित्र! मैं (तेरे दोनों) पैर मलूँगा, (इनको) मल-मल के धोऊँगा, मैं अपना ये मन तेरे हवाले कर दूँगा। हे मित्र! (मेरी विनती) सुन। मैं तेरी शरण आया हूँ। मुझे (ऐसा) उपदेश दे (कि) मैं प्रभू को मिल सकूँ।2।
(नोट: गुरमुख मिलाप की युक्ति बताता है)
हे मित्र! सुन। (किसी किस्म का) अहंकार नहीं करना चाहिए। जो कुछ परमात्मा कर रहा है, उसे भला करके मानना चाहिए। ये जिंद और ये शरीर सब कुछ उसकी भेट कर देना चाहिए। इस तरह परमात्मा को पा लिया जाता है।3।
हे मित्र! संत जनों की कृपा से (जिस मनुष्य पर प्रभू की) मेहर हो उसे परमात्मा का नाम प्यारा लगने लग जाता है। (हे मित्र!) दास नानक पर गुरू ने कृपा की तो (नानक को) हर जगह वह प्रभू दिखाई देने लगा, जिसका कोई विशेष कुल नहीं, जो माया के प्रभाव से परे है।4।1।12।



