Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar – 29-11-25

सूही महला ४ ॥
हरि पहिलड़ी लाव परविरती करम द्रिड़ाइआ बलि राम जीउ ॥ बाणी ब्रहमा वेदु धरमु द्रिड़हु पाप तजाइआ बलि राम जीउ ॥ धरमु द्रिड़हु हरि नामु धिआवहु सिम्रिति नामु द्रिड़ाइआ ॥ सतिगुरु गुरु पूरा आराधहु सभि किलविख पाप गवाइआ ॥ सहज अनंदु होआ वडभागी मनि हरि हरि मीठा लाइआ ॥ जनु कहै नानकु लाव पहिली आर्मभु काजु रचाइआ ॥१॥ हरि दूजड़ी लाव सतिगुरु पुरखु मिलाइआ बलि राम जीउ ॥ निरभउ भै मनु होइ हउमै मैलु गवाइआ बलि राम जीउ ॥ निरमलु भउ पाइआ हरि गुण गाइआ हरि वेखै रामु हदूरे ॥ हरि आतम रामु पसारिआ सुआमी सरब रहिआ भरपूरे ॥ अंतरि बाहरि हरि प्रभु एको मिलि हरि जन मंगल गाए ॥ जन नानक दूजी लाव चलाई अनहद सबद वजाए ॥२॥ हरि तीजड़ी लाव मनि चाउ भइआ बैरागीआ बलि राम जीउ ॥ संत जना हरि मेलु हरि पाइआ वडभागीआ बलि राम जीउ ॥ निरमलु हरि पाइआ हरि गुण गाइआ मुखि बोली हरि बाणी ॥ संत जना वडभागी पाइआ हरि कथीऐ अकथ कहाणी ॥ हिरदै हरि हरि हरि धुनि उपजी हरि जपीऐ मसतकि भागु जीउ ॥ जनु नानकु बोले तीजी लावै हरि उपजै मनि बैरागु जीउ ॥३॥ हरि चउथड़ी लाव मनि सहजु भइआ हरि पाइआ बलि राम जीउ ॥ गुरमुखि मिलिआ सुभाइ हरि मनि तनि मीठा लाइआ बलि राम जीउ ॥ हरि मीठा लाइआ मेरे प्रभ भाइआ अनदिनु हरि लिव लाई ॥ मन चिंदिआ फलु पाइआ सुआमी हरि नामि वजी वाधाई ॥ हरि प्रभि ठाकुरि काजु रचाइआ धन हिरदै नामि विगासी ॥ जनु नानकु बोले चउथी लावै हरि पाइआ प्रभु अविनासी ॥४॥२॥ {पन्ना 773}

अर्थ: हे राम जी! मैं तुझसे सदके जाता हूँ। (तेरी मेहर से गुरू के सिख को) हरी-नाम जपने के आहर में व्यस्त होने का काम निश्चय करवाया है (हरी-नाम जपने की कर्म प्रवृति दृढ़ करवाई है)। यही है प्रभू-पति से (जीव-स्त्री के विवाह की) पहली सुंदर लांव। हे भाई! गुरू की बाणी ही (सिख के लिए) ब्रहमा के वेद हैं। इस बाणी की बरकति से (परमात्मा के नाम के सिमरन का) धर्म (अपने हृदय में) पक्का करो (नाम सिमरने से सारे) पाप दूर हो जाते हैं। हे भाई! परमात्मा का नाम सिमरते रहो, (मनुष्य के जीवन का यह) धर्म (अपने अंदर) पक्का कर लो। गुरू ने जो नाम-सिमरन की ताकीद की है, यही सिख के लिए स्मृतियों (का उपदेश) है। हे भाई! पूरे गुरू (के इस उपदेश को) हर वक्त याद रखो, सारे पाप विकार (इसकी बरकति से) दूर हो जाते हैं।

हे भाई! जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम प्यारा लगने लग जाता है, उस अति भाग्यशाली को आत्मिक अडोलता का सुख मिला रहता है। दास नानक कहता है– परमात्मा का नाम जपना प्रभू-पति के साथ जीव-स्त्री के विवाह की पहली लांव है। हरी के नाम सिमरन से ही (प्रभू-पति से जीव-स्त्री के) विवाह (का) आगाज़ (आरम्भ) होता है।1।

हे राम जी! मैं तुझसे कुर्बान जाता हूँ। (तू मेहर करके जिस जीव-स्त्री को) गुरू महापुरुख मिलवा देता है (उसका) मन (दुनिया के) सारे डरों से निडर हो जाता है (निर्भय हो जाता है), (गुरू, उसके अंदर से) अहंकार की मैल दूर कर देता है– यही है प्रभू पति के (जीव-स्त्री के विवाह की) दूसरी सुंदर लांव।

हे भाई! (जो जीव-स्त्री अहंकार दूर करके) परमात्मा के गुण गाती है, उसके अंदर (प्रभू-पति के लिए) आदर-सत्कार पैदा हो जाता है, वह परमात्मा को अपने अंग-संग बसता देखती है। (उसे ये निश्चय हो जाता है कि यह जगत-पसारा) प्रभू अपने स्वयं का पसारा पसार रहा है, और वह मालिक-प्रभू सब जीवों में व्याप रहा है। (उस जीव-स्त्री को अपने) अंदर और बाहर (सारे जगत में) सिर्फ परमात्मा ही (बसता दिखता है), साध-संगति में मिल के वह प्रभू की सिफत सालाह के गीत गाती रहती है।

हे दास नानक! (कह– गुरू की शरण पड़ कर, अहंकार दूर करके प्रभू की सिफत-सालाह के गीत गाने और उसे सर्व-व्यापक देखना- प्रभू ने यह) दूसरी लांव (जीव-स्त्री के विवाह की) चाल दी है, (इस आत्मिक अवस्था पर पहुँची जीव-स्त्री के अंदर प्रभू) सिफत सालाह की बाणी के, जैसे एक-रस बाजे बजा देता है।2।

हे राम जी! मैं तेरे से सदके जाता हूँ। (तेरी मेहर से) वैरागियों के मन में (तेरे से मिलने के लिए) तीव्र तमन्ना पैदा होती है, (ये आत्मिक अवस्था प्रभू-पति के साथ जीव-स्त्री के विवाह की) तीसरी सुंदर लांव है।

हे भाई! जिन अति-भाग्यशाली मनुष्यों को संतजनों का मिलाप हासिल होता है, उनको परमात्मा का मेल प्राप्त होता है, (वे मनुष्य जीवन को) पवित्र करने वाले प्रभू का मिलाप हासिल करते हैं, सदा प्रभू के गुण गाते हैं, और मुँह से परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी उचारते हैं, वह अति-भाग्यशाली मनुष्य संत-जनों की संगति में प्रभू-मिलाप प्राप्त करते हैं।

हे भाई! अकॅथ प्रभू की सिफत सालाह हमेशा करते रहना चाहिए, (जो मनुष्य प्रभू की सिफत-सालाह सदा करता रहता है, उसके) हृदय में सदा टिकी रहने वाली प्रभू-प्रेम की रौंअ चल पड़ती है। पर, हे भाई! परमात्मा का नाम (तब ही) जपा जा सकता है, अगर माथे पर अहो-भाग्य जाग जाएं।

हे भाई! दास नानक कहता है (कि प्रभू-पति के साथ जीव-स्त्री की) तीसरी लांव के समय (जीव-स्त्री के) मन में प्रभू (-मिलाप की) तीव्र चाहत पैदा हो जाती है।3।

हे सुंदर राम जी! मैं तुझसे सदके हूँ। (तेरी मेहर से जिस जीव-स्त्री के) मन में आत्मिक अडोलता पैदा हो जाती है, उसको तेरा मिलाप हासिल हो जाता है (ये आत्मिक अवस्था प्रभू-पति के साथ जीव-स्त्री के मिलाप की) चौथी लांव है।

हे भाई! गुरू की शरण पड़ कर (प्रभू-) प्रेम में (टिक के, जिस जीव-स्त्री को प्रभू) मिल जाता है, (उसके) मन में (उसके) तन में प्रभू प्यारा लगने लग जाता है।

हे भाई! जिस जीव को परमात्मा प्यारा लगने लग जाता है, प्रभू को (भी) वह जीव प्यारा लगने लगता है, वह मनुष्य सदा प्रभू की याद में (अपनी) सुरति जोड़े रखता है, वह मनुष्य प्रभू-मिलाप का मन-बाँछित फल प्राप्त कर लेता है। प्रभू के नाम की बरकति से (उसके अंदर सदा) चढ़दीकला बनी रहती है।

हे भाई! प्रभू ने, मालिक हरी ने (जिस जीव-स्त्री के) विवाह का उद्यम शुरू कर दिया, वह जीव-स्त्री नाम-सिमरन की बरकति से (अपने) दिल में सदैव आनंद-भरपूर रहती है। दास नानक कहता है– प्रभू-पति के साथ जीव-स्त्री के विवाह की चौथी लांव के समय जीव-स्त्री कभी नाश ना होने वाले प्रभू के मिलाप का आनंद प्राप्त कर लेती है।4।2।

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