Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar – 31-7-25

सलोक मः ३ ॥
सजण मिले सजणा जिन सतगुर नालि पिआरु ॥ मिलि प्रीतम तिनी धिआइआ सचै प्रेमि पिआरु ॥ मन ही ते मनु मानिआ गुर कै सबदि अपारि ॥ एहि सजण मिले न विछुड़हि जि आपि मेले करतारि ॥ इकना दरसन की परतीति न आईआ सबदि न करहि वीचारु ॥ विछुड़िआ का किआ विछुड़ै जिना दूजै भाइ पिआरु ॥ मनमुख सेती दोसती थोड़ड़िआ दिन चारि ॥ इसु परीती तुटदी विलमु न होवई इतु दोसती चलनि विकार ॥ जिना अंदरि सचे का भउ नाही नामि न करहि पिआरु ॥ नानक तिन सिउ किआ कीचै दोसती जि आपि भुलाए करतारि ॥१॥ मः ३ ॥ इकि सदा इकतै रंगि रहहि तिन कै हउ सद बलिहारै जाउ ॥ तनु मनु धनु अरपी तिन कउ निवि निवि लागउ पाइ ॥ तिन मिलिआ मनु संतोखीऐ त्रिसना भुख सभ जाइ ॥ नानक नामि रते सुखीए सदा सचे सिउ लिव लाइ ॥२॥ पउड़ी ॥ तिसु गुर कउ हउ वारिआ जिनि हरि की हरि कथा सुणाई ॥ तिसु गुर कउ सद बलिहारणै जिनि हरि सेवा बणत बणाई ॥ सो सतिगुरु पिआरा मेरै नालि है जिथै किथै मैनो लए छडाई ॥ तिसु गुर कउ साबासि है जिनि हरि सोझी पाई ॥ नानकु गुर विटहु वारिआ जिनि हरि नामु दीआ मेरे मन की आस पुराई ॥५॥ {पन्ना 587}

अर्थ: जिन (सत्संगियों) का गुरू से प्रेम होता है, वह सत्संगियों को मिलते हैं; सत्संगियों को मिल के वही मनुष्य प्रभू प्रीतम को सिमरते हैं क्योंकि सच्चे प्यार में उनकी बिरती जुड़ी रहती है; सतिगुरू के अपार शबद की बरकति से उनका मन खुद-ब-खुद ही प्रभू में पतीज जाता है; ऐसे सत्संगी मनुष्य (एक बार) मिले हुए फिर विछुड़ते नहीं हैं, क्योंकि करतार ने खुद इनको मिला दिया है।

एक ( विछुड़े हुओं) को प्रभू के दीदार का यकीन ही नहीं होता, क्योंकि वे गुरू के शबद का कभी विचार ही नहीं करते। पर, जिन मनुष्यों की सुरति सदा माया के मोह में जुड़ी रहती है, उन (प्रभू से) विछुड़े हुओं का और विछोड़ा भी क्या होना हुआ? (भाव, माया में फंसे रहने के कारण वे परमात्मा से विछोड़ा महसूस ही नहीं करते)।

जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है उससे मित्रता थोड़े ही दो-चार दिन के लिए ही रह सकती है, इस मित्रता के टूटते हुए देरी नहीं लगती, (वैसे भी) इस मित्रता में से बुराईयां ही जन्म लेती हैं। हे नानक! जिन मनुष्यों के हृदय में परमात्मा का डर नहीं, जो परमात्मा के नाम से कभी प्यार नहीं करते उनके साथ कभी अपनत्व डालना ही नहीं चाहिए।1।

कई (भाग्यशाली) मनुष्य एक (प्रभू के) रंग में ही (मस्त) रहते हैं, मैं उनसे कुर्बान हूँ; (मेरा चिक्त करता है) उपना तन-मन-धन उनकी भेटा कर दूँ और झुक-झुक के उनके पैरों पर लगूँ। उनको मिल के मन को ठंडक पड़ती है, सारी तृष्णा और भूख दूर हो जाती है।

हे नानक! नाम में भीगे हुए मनुष्य सच्चे प्रभू के साथ चिक्त जोड़ के सदा सुखी रहते हैं।2।

मैं सदके हूँ उस सतिगुरू से जिसने प्रभू की बात सुनाई है, और जिसने प्रभू की भक्ति की रीत चलाई है। वह प्यारा सतिगुरू मेरे अंग-संग है, हर जगह मुझे (विकारों से) छुड़वा लेता है; शाबाश है उस सतिगुरू को जिसने मुझे परमात्मा की समझ दी है।

जिस गुरू ने मुझे परमात्मा का नाम दिया है और मेरे मन की आस पूरी की है मैं नानक उससे सदके हूँ।5।

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