सूही महला १ ॥
भांडा हछा सोइ जो तिसु भावसी ॥ भांडा अति मलीणु धोता हछा न होइसी ॥ गुरू दुआरै होइ सोझी पाइसी ॥ एतु दुआरै धोइ हछा होइसी ॥ मैले हछे का वीचारु आपि वरताइसी ॥ मतु को जाणै जाइ अगै पाइसी ॥ जेहे करम कमाइ तेहा होइसी ॥ अम्रितु हरि का नाउ आपि वरताइसी ॥ चलिआ पति सिउ जनमु सवारि वाजा वाइसी ॥ माणसु किआ वेचारा तिहु लोक सुणाइसी ॥ नानक आपि निहाल सभि कुल तारसी ॥१॥४॥६॥ {पन्ना 730}
अर्थ: वही हृदय पवित्र है जो उस परमात्मा को अच्दा लगने लगता है। अगर मनुष्य का हृदय (अंदर से विकारों से) बहुत गंदा हुआ पड़ा है तो बाहर से शरीर को तीर्थ आदि पर स्नान कराने से हृदय शुद्ध नहीं हो सकता।
अगर गुरू के दर पर (स्वै भाव मिटा के सवाली) बनें, तो ही (हृदय को पवित्र करने की) बुद्धि मिलती है। गुरू के दर पर रह के ही (विकारों की मैल) धोने से हृदय पवित्र होता है। (अगर गुरू के दर पर टिकें तो) परमात्मा खुद ही ये (विचारने की) समझ देता है कि हम अच्छे हैं अथवा बुरे।
(अगर इस मनुष्य-जीवन के समय में गुरू का आसरा नहीं लिया तो) कोई जीव ये ना समझ ले कि (यहाँ से खाली हाथ) जा के परलोक में (जीवन पवित्र करने की सूझ) मिलेगी। (ये एक कुदरती नियम है कि यहाँ) मनुष्य जिस प्रकार के कर्म करता है वैसा वह बन जाता है।
(जो मनुष्य गुरू के दर से गिरता है उसको) आत्मिक जीवन देने वाला अपना नाम खुद बख्शता है। (जिस मनुष्य को यह दाति मिलती है) वह अपना मानस जनम सँवार के आदर कमा के यहाँ से जाता है, वह अपनी शोभा का बाजा (यहाँ) बजा जाता था। कोई एक मनुष्य तो क्या ? तीनों ही लोकों में परमात्मा उसकी शोभा बिखेरता है। हे नानक! वह मनुष्य खुद सदा प्रसन्न-चिक्त रहता है, और अपनी सारी कुलों को ही तैरा लेता है (शोभा दिलवाता है)।1।4।6।
नोट: इस शबद में अलग–अलग बंद नहीं हैं। सारा शबद समूचे तौर पर एक बँद गिना गया है। ‘घरु ६’ का ये चौथा शबद है।



