सोरठि महला १ घरु १ ॥
मनु हाली किरसाणी करणी सरमु पाणी तनु खेतु ॥ नामु बीजु संतोखु सुहागा रखु गरीबी वेसु ॥ भाउ करम करि जमसी से घर भागठ देखु ॥१॥ बाबा माइआ साथि न होइ ॥ इनि माइआ जगु मोहिआ विरला बूझै कोइ ॥ रहाउ ॥ हाणु हटु करि आरजा सचु नामु करि वथु ॥ सुरति सोच करि भांडसाल तिसु विचि तिस नो रखु ॥ वणजारिआ सिउ वणजु करि लै लाहा मन हसु ॥२॥ सुणि सासत सउदागरी सतु घोड़े लै चलु ॥ खरचु बंनु चंगिआईआ मतु मन जाणहि कलु ॥ निरंकार कै देसि जाहि ता सुखि लहहि महलु ॥३॥ लाइ चितु करि चाकरी मंनि नामु करि कमु ॥ बंनु बदीआ करि धावणी ता को आखै धंनु ॥ नानक वेखै नदरि करि चड़ै चवगण वंनु ॥४॥२॥ {पन्ना 595}
नोट: धन कमाने के लिए आम तौर पर चार तरीके हैं– किसानी, दुकान, व्यापार और नौकरी। इस शबद में फरमाते हैं कि दुनिया का धन यहाँ से चलने के वक्त साथ छोड़ देगा, साथ निभने वाला तो नाम-धन है, उसे इकट्ठा करने के लिए वैसे ही मेहनत करनी है जैसे किसान खेती के लिए मेहनत करता है, दुकानदार दुकान में, व्यापारी व्यापार में और मुलाजिम नौकरी में।
अर्थ: हे भाई! (यहाँ से चलने के वक्त) माया जीव के साथ नहीं जाती (ये हरेक को पता है फिर भी) इस माया ने सारे जगत को अपने वश में किया हुआ है। कोई विरला मनुष्य समझता है (कि सदा साथ निभने वाला धन और है)।1। रहाउ।
(हे भाई! सदा साथ निभने वाला धन कमाने के लिए) मन को किसान (जैसा उद्यमी) बना, ऊँचे आचरण को खेती समझ, मेहनत (नाम के फसल के लिए) पानी है, (ये अपना) शरीर (ही) जमीन है। (इस जमीन में) परमात्मा का नाम बीज, (बीज बो के उसे पक्षियों से बचाने के लिए सोहागा फेरना जरूरी है, इसी तरह अगर संतोष वाला जीवन नहीं, तो माया की तृष्णा नाम-बीज को समाप्त कर देगी) संतोष (नाम-बीज को तृष्णा-पक्षियों से बचाने के लिए) सुहागा है, सादा जीवन (नाम-फसल की रक्षा करने के लिए) रखवाला है। (हे भाई! ऐसी किसानी करने से शरीर-भूमि में) परमात्मा की मेहर से प्रेम पैदा होगा। देख, (जिन्होंने ऐसी खेती की) उनके हृदय (नाम-धन से) धनाढ हो गऐ।1।
(हे भाई!) उम्र की हरेक सांस को कमाई बना, इस दुकान में सदा-स्थिर रहने वाला हरी का नाम सौदा बना। अपनी सुरति के विचार-मण्डल को बर्तनों की कतार बना, इस बर्तनों की कतार में (बर्तनशाला में) हरी-नाम सौदे को डाल। ये नाम-वाणज्य करने वाले सत्संगियों से मिल के तू भी हरी नाम का व्यापार कर। इस व्यापार से कमाई होगी मन का खिलना।2।
(हे भाई! सौदागरों की तरह हरी-नाम का सौदागर बन) धर्म-पुस्तकों (का उपदेश) सुना कर, ये हरी-नाम की सौदागिरी है, (सौदागरी का माल असबाब लादने के लिए) उच्च आचरण वाले घोड़े बना के चल, (जिंदगी के सफर में भी खर्च की जरूरत है) अच्छे गुणों को जीवन-यात्रा का खर्च बना। हे मन! (इस व्यापार के उद्यम को) कल पर ना डालना। इस व्यापार से अगर तू परमात्मा के देश में (परमात्मा के चरणों में) टिक जाएं, तो आत्मिक सुख में जगह तलाश लेगा।3।
(हे भाई! नौकर रोजी कमाने के लिए मेहनत से मालिक की सेवा करता है, तू भी) पूरे ध्यान से (प्रभू मालिक की) नौकरी कर (जैसे नौकर अपने मालिक के हुकम को भुलाता नहीं, तू भी) परमात्मा मालिक के नाम को मन में पक्का करके रख, यही है उसकी सेवा। विकारों को (अपने नजदीक आने से) रोक दे, ये है परमात्मा की नौकरी की दौड़-भाग। (यदि ये उद्यम करेगा) तो हर कोई तुझे साबाशी देगा। हे नानक! ऐसी नौकरी करने से परमात्मा तुझे मेहर की नजर से देखेगा, तेरी जीवात्मा पर चौगुना आत्मिक-रूप चढ़ेगा।4।2।



