रागु सूही असटपदीआ महला ४ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कोई आणि मिलावै मेरा प्रीतमु पिआरा हउ तिसु पहि आपु वेचाई ॥१॥ दरसनु हरि देखण कै ताई ॥ क्रिपा करहि ता सतिगुरु मेलहि हरि हरि नामु धिआई ॥१॥ रहाउ ॥ जे सुखु देहि त तुझहि अराधी दुखि भी तुझै धिआई ॥२॥ जे भुख देहि त इत ही राजा दुख विचि सूख मनाई ॥३॥ तनु मनु काटि काटि सभु अरपी विचि अगनी आपु जलाई ॥४॥ पखा फेरी पाणी ढोवा जो देवहि सो खाई ॥५॥ नानकु गरीबु ढहि पइआ दुआरै हरि मेलि लैहु वडिआई ॥६॥ अखी काढि धरी चरणा तलि सभ धरती फिरि मत पाई ॥७॥ जे पासि बहालहि ता तुझहि अराधी जे मारि कढहि भी धिआई ॥८॥ जे लोकु सलाहे ता तेरी उपमा जे निंदै त छोडि न जाई ॥९॥ जे तुधु वलि रहै ता कोई किहु आखउ तुधु विसरिऐ मरि जाई ॥१०॥ वारि वारि जाई गुर ऊपरि पै पैरी संत मनाई ॥११॥ नानकु विचारा भइआ दिवाना हरि तउ दरसन कै ताई ॥१२॥ झखड़ु झागी मीहु वरसै भी गुरु देखण जाई ॥१३॥ समुंदु सागरु होवै बहु खारा गुरसिखु लंघि गुर पहि जाई ॥१४॥ जिउ प्राणी जल बिनु है मरता तिउ सिखु गुर बिनु मरि जाई ॥१५॥ जिउ धरती सोभ करे जलु बरसै तिउ सिखु गुर मिलि बिगसाई ॥१६॥ सेवक का होइ सेवकु वरता करि करि बिनउ बुलाई ॥१७॥ नानक की बेनंती हरि पहि गुर मिलि गुर सुखु पाई ॥१८॥ तू आपे गुरु चेला है आपे गुर विचु दे तुझहि धिआई ॥१९॥ जो तुधु सेवहि सो तूहै होवहि तुधु सेवक पैज रखाई ॥२०॥ भंडार भरे भगती हरि तेरे जिसु भावै तिसु देवाई ॥२१॥ जिसु तूं देहि सोई जनु पाए होर निहफल सभ चतुराई ॥२२॥ सिमरि सिमरि सिमरि गुरु अपुना सोइआ मनु जागाई ॥२३॥ इकु दानु मंगै नानकु वेचारा हरि दासनि दासु कराई ॥२४॥ जे गुरु झिड़के त मीठा लागै जे बखसे त गुर वडिआई ॥२५॥ गुरमुखि बोलहि सो थाइ पाए मनमुखि किछु थाइ न पाई ॥२६॥ पाला ककरु वरफ वरसै गुरसिखु गुर देखण जाई ॥२७॥ सभु दिनसु रैणि देखउ गुरु अपुना विचि अखी गुर पैर धराई ॥२८॥ अनेक उपाव करी गुर कारणि गुर भावै सो थाइ पाई ॥२९॥ रैणि दिनसु गुर चरण अराधी दइआ करहु मेरे साई ॥३०॥ नानक का जीउ पिंडु गुरू है गुर मिलि त्रिपति अघाई ॥३१॥ नानक का प्रभु पूरि रहिओ है जत कत तत गोसाई ॥३२॥१॥ {पन्ना 757}
अर्थ: हे प्रभू! अगर तू (मेरे पर) मेहर करे, (मुझे) गुरू मिला दे, तो तेरे दर्शन करने के लिए मैं सदा तेरा नाम सिमरता रहूँगा।1। रहाउ।
हे भाई! अगर कोई (सज्जन) मेरा प्रीतम ला के मुझे मिला दे, तो मैं उसके आगे अपना आप बेच दूँ।1।
हे प्रभू! (मेहर कर) अगर तू मुझे सुख दे, तो मैं तुझे ही सिमरता रहूँ, दुख में भी मैं तेरी ही आराधना करता रहूँ।2।
हे प्रभू! अगर तू मुझे भूखा रखे, तो मैं इस भूख में ही तृप्त रहूँगा, दुख में मैं सुख प्रतीत करूँगा (तेरी ये मेहर जरूर हो जाए कि मुझे तेरे दर्शन हो जाएं)।3।
हे प्रभू! (तेरे दर्शन करने की खातिर अगर जरूरत पड़े तो) मैं अपना शरीर अपना मन काट काट के सारा भेटा कर दूँगा, आग में अपने आप को जला (भी) दूँगा।4।
हे प्रभू! (तेरे दीदार की खातिर, तेरी संगतों को) मैं पंखा झेलूँगा, पानी ढोऊँगा, जो कुछ तू मुझे (खाने के लिए) देगा वही (खुश हो के) खा लूँगा।5।
हे प्रभू! (तेरा दास) गरीब नानक तेरे दर पर आ गिरा है, मुझे अपने चरणों में जोड़ ले, तेरा ये उपकार होगा।6।
अर्थ: हे प्रभू! (अगर जरूरत पड़े तो) मैं अपनी आँखें निकाल के (गुरू के) पैरों तले रख दूँ, मैं सारी धरती पर तलाश करूँ कि शायद कहीं गुरू मिल जाए।7।
हे प्रभू! यदि तू मुझे अपने पास बैठा ले, तो तुझे आराधता रहूँ, अगर तू मुझे (धक्के) मार के (अपने दर से) निकाल दे, तो भी मैं तेरा ही ध्यान धरता रहूँगा।8।
हे प्रभू! अगर जगत मुझे अच्छा कहेगा, तो (दरअसल) ये तेरी ही उपमा होगी, अगर (तेरी सिफत सालाह करने के कारण) दुनिया मेरी निंदा करेगी, तो भी मैं (तुझे) छोड़ के नहीं जाऊँगा।9।
हे प्रभू! अगर मेरी प्रीति तेरे पास बनी रहे, तो बेशक कोई कुछ भी मुझे कहता फिरे। पर, तुझे भूलते ही, हे प्रभू! मैं आत्मिक मौत मर जाऊँगा।10।
हे प्रभू! (तेरे दर्शनों की खातिर) मैं गुरू पर कुर्बान-कुर्बान जाऊँगा, मैं संत-गुरू के चरणों में पड़ के उसको प्रसन्न करूँगा।11।
हे हरी! तेरे दर्शन करने की खातिर (तेरा दास) बेचारा नानक कमला हुआ फिरता है।12।
अर्थ: हे प्रभू! (तेरा मिलाप प्राप्त करने की खातिर) मैं गुरू के दर्शनों के लिए झक्खड़-अंधेरी (अपने सिर पर) झेलने के लिए भी तैयार हूँ, अगर बारिश होने लगे तो भी (बरसती बारिश में ही) मैं गुरू को देखने के लिए जाने को तैयार हूँ।13।
हे भाई! खारा समुंद्र भी लांघना पड़े तो भी उसको लांघ के गुरू का सिख गुरू के पास पहुँचता है।14।
जैसे प्राणी पानी के बिना मरने लगता है, वैसे ही सिख गुरू को मिले बिना अपनी आत्मिक मौत आ गई समझता है।15।
जैसे जब बारिश होती है तब धरती सुंदर लगने लगती है, वैसे ही सिख को मिल के प्रसन्न होता है।16।
हे भाई! मैं गुरू के सेवक का सेवक बन के उसके काम करने को तैयार हूँ मैं उसको विनतियाँ कर कर के (खुशी से) बुलाऊँगा।17।
नानक की परमात्मा के पास विनती है (- हे प्रभू! मुझे गुरू मिला) गुरू को मिल के मुझे बड़ा आनंद प्राप्त होता है।18।
अर्थ: हे प्रभू! तू स्वयं ही गुरू है, तू खुद ही सिख है। मैं गुरू के द्वारा तुझे ही ध्याता हूँ।19।
हे प्रभू! जो मनुष्य तेरी सेवा-भक्ति करते हैं, वे तेरा ही रूप बन जाते हैं। तू अपने सेवकों की इज्जत (सदा) रखता आया है।20।
हे हरी! तेरे पास तेरी भक्ति के खजाने भरे पड़े हैं। जिस पर तेरी रजा होती है उसको तू (गुरू के द्वारा ये खजाना) दिलवाता है।21।
हे प्रभू! (तेरी भक्ति का खजाना प्राप्त करने के लिए) हरेक समझदारी-चतुराई बेकार है। वही मनुष्य (इस खजाने को) हासिल करता है जिसको तू खुद देता है।22।
हे प्रभू! (तेरी मेहर से) मैं अपने गुरू को बार-बार याद करके (माया के मोह की नींद में) सोए हुए अपने मन को जगाता रहता हूँ।23।
हे प्रभू! (तेरे दर से तेरा) गरीब (दास) नानक एक दान माँगता है– (मेहर कर) मुझे अपने दासों का दास बनाए रख।24।
अर्थ: अगर गुरू (मुझे मेरी किसी भूल के कारण) फटकार दे, तो उसकी वह झिड़क मुझे प्यारी लगती है। अगर गुरू मेरे पर मेहर की निगाह करता है, तो ये गुरू का उपकार है (मुझ में कोई कोई गुण नहीं)।25।
गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य जो वचन बोलते हैं, गुरू उन्हें परवान करता है। अपने मन के पीछे चलने वालों का बोला हुआ कबूल नहीं होता।26।
पाला पड़े, कक्कर पड़े, बर्फ पड़े, फिर भी गुरू का सिख गुरू के दर्शन करने जाता है।27।
मैं भी दिन-रात हर वक्त अपने गुरू के दर्शन करता रहता हूँ। गुरू के चरणों को अपनी आँखों में बसाए रखता हूँ।28।
अगर मैं गुरू (को प्रसन्न करने) के लिए अनेकों ही यत्न करता रहूँ वही प्रयत्न कबूल होता है, जो गुरू को पसंद आता है।29।
हे मेरे पति-प्रभू! (मेरे पर) मेहर कर, मैं दिन-रात हर वक्त गुरू के चरणों का ध्यान धरता रहूँ।30।
नानक की जिंद गुरू के हवाले है, नानक का शरीर गुरू के चरणों में है। गुरू को मिल के मैं तृप्त हो जाता हूँ, अघा जाता हूँ (माया की भूख नहीं रह जाती)।31।
(गुरू की कृपा से ये समझ आती है कि) नानक का प्रभू सब सृष्टि का पति हर जगह व्यापक हो रहा है।32।1।



