बिलावलु महला ५ ॥
भूले मारगु जिनहि बताइआ ॥ ऐसा गुरु वडभागी पाइआ ॥१॥ सिमरि मना राम नामु चितारे ॥ बसि रहे हिरदै गुर चरन पिआरे ॥१॥ रहाउ ॥ कामि क्रोधि लोभि मोहि मनु लीना ॥ बंधन काटि मुकति गुरि कीना ॥२॥ दुख सुख करत जनमि फुनि मूआ ॥ चरन कमल गुरि आस्रमु दीआ ॥३॥ अगनि सागर बूडत संसारा ॥ नानक बाह पकरि सतिगुरि निसतारा ॥४॥३॥८॥ {पन्ना 803-804}
अर्थ: हे (मेरे) मन! ध्यान जोड़ के परमात्मा का नाम सिमरा कर। (पर वही मनुष्य हरी नाम का सिमरन करता है, जिसके) हृदय में प्यारे सतिगुरू के चरन बसे रहते हैं (इसलिए, हे मन! तू भी गुरू का आसरा ले)।1। रहाउ।
(हे मन!) ऐसा गुरू बड़े भाग्यों से ही मिलता है, जो (जीवन के सही रास्ते से) विचलित होते जा रहे मनुष्य को (जिंदगी का सही) रास्ता बता देता है।1।
(हे मन! देख, मनुष्य का) मन (सदा) काम में, क्रोध में लोभ में फंसा रहता है। (पर जब वह गुरू की शरण आया), गुरू ने (उसके ये सारे) बँधन काट के उसको (इन विकारों से) खलासी दे दी।2।
हे मन! दुख-सुख करते हुए मनुष्य कभी मरता है कभी जी उठता है (दुख के आने पर सहम जाता है, सुख मिलने पर आराम की साँस लेने लग जाता है। इस प्रकार डुबकियाँ लेते हुए जब मनुष्य गुरू की शरण आया) गुरू ने उसको सुंदर चरणों का आसरा दे दिया।3।
हे नानक! जगत तृष्णा की आग के समुंद्र में डूब रहा है। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ा) गुरू ने (उसकी) बाँह पकड़ के (उसे संसार-समुंद्र में से) पार लंघा दिया।4।3।8।



