सोरठि महला ५ घरु १ असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभु जगु जिनहि उपाइआ भाई करण कारण समरथु ॥ जीउ पिंडु जिनि साजिआ भाई दे करि अपणी वथु ॥ किनि कहीऐ किउ देखीऐ भाई करता एकु अकथु ॥ गुरु गोविंदु सलाहीऐ भाई जिस ते जापै तथु ॥१॥ मेरे मन जपीऐ हरि भगवंता ॥ नाम दानु देइ जन अपने दूख दरद का हंता ॥ रहाउ ॥ जा कै घरि सभु किछु है भाई नउ निधि भरे भंडार ॥ तिस की कीमति ना पवै भाई ऊचा अगम अपार ॥ जीअ जंत प्रतिपालदा भाई नित नित करदा सार ॥ सतिगुरु पूरा भेटीऐ भाई सबदि मिलावणहार ॥२॥ {पन्ना 639}
अर्थ: हे मेरे मन! (हमेशा) हरी भगवान का नाम जपना चाहिए। वह भगवान अपने सेवक को अपने नाम की दाति देता है। वह सारी दुख-पीड़ाओं को नाश करने वाला है। रहाउ।
हे भाई! जिस परमात्मा ने आप ही सारा जगत पैदा किया है, जो सारे जगत का मूल है, जो सारी शक्तियों का मालिक है, जिसने अपनी वस्तु (सक्ता) दे के (मनुष्य की) जीवात्मा और शरीर पैदा किए हैं, वह करतार (तो) किसी भी पक्ष से बयान नहीं किया जा सकता। हे भाई उस करतार का रूप बताया नहीं जा सकता। उसे कैसे देखा जाए? हे भाई! गोबिंद के रूप गुरू की सिफत करनी चाहिए, क्योंकि गुरू से ही सारे जगत के मूल परमात्मा की सूझ पड़ सकती है।1।
हे भाई! जिस प्रभू के घर में हरेक चीज मौजूद है, जिस के घर में जगत के सारे नौ ही खजाने विद्यमान हैं, जिसके घर में भंडारे भरे पड़े हैं, उसका मूल्य नहीं आंका जा सकता। वह सबसे ऊँचा है, वह अपहुँच है, वह बेअंत है। हे भाई! वह प्रभू सारे जीवों की पालना करता है, वह सदा ही (सब जीवों की) संभाल करता है। (उसका दर्शन करने के लिए) हे भाई! पूरे गुरू को मिलना चाहिए, (गुरू ही अपने) शबद में जोड़ के परमात्मा के साथ मिला सकने वाला है।2।



