सूही महला ५ ॥
बहती जात कदे द्रिसटि न धारत ॥ मिथिआ मोह बंधहि नित पारच ॥१॥ माधवे भजु दिन नित रैणी ॥ जनमु पदारथु जीति हरि सरणी ॥१॥ रहाउ ॥ करत बिकार दोऊ कर झारत ॥ राम रतनु रिद तिलु नही धारत ॥२॥ भरण पोखण संगि अउध बिहाणी ॥ जै जगदीस की गति नही जाणी ॥३॥ सरणि समरथ अगोचर सुआमी ॥ उधरु नानक प्रभ अंतरजामी ॥४॥२७॥३३॥ {पन्ना 743}
अर्थ: हे भाई! दिन-रात सदा माया के पति प्रभू का नाम जपा कर। प्रभू की शरण पड़ कर कीमती मानस जन्म का फायदा उठा ले।1।
हे भाई! (तेरी उम्र की नदी) बहती जा रही है, पर तू इधर ध्यान नहीं करता। तू नाशवंत पदार्थों के मोह के बँधन ही सदा बाँधता रहता है।1।
हे भाई! तू हानि-लाभ विचारे बिना ही विकार किए जा रहा है परमात्मा का रत्न (जैसा कीमती) नाम अपने दिल में तू एक पल के लिए भी नहीं टिकाता।2।
हे भाई! (अपना शरीर) पालने-पोसने में ही तेरी उम्र बीतती जा रही है। परमात्मा की सिफत सालाह के आनंद की अवस्था तू (अब तक) समझी ही नहीं।3।
हे नानक! (कह–) हे सब ताकतों के मालिक! ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे रहने वाले हे मालिक! मैं तेरी शरण आया हूँ, (मुझे विकारों से) बचा ले, तू मेरा मालिक है, तू मेरे दिल की जानने वाला है।4।27।33।



