सूही महला ३ ॥
जुग चारे धन जे भवै बिनु सतिगुर सोहागु न होई राम ॥ निहचलु राजु सदा हरि केरा तिसु बिनु अवरु न कोई राम ॥ तिसु बिनु अवरु न कोई सदा सचु सोई गुरमुखि एको जाणिआ ॥ धन पिर मेलावा होआ गुरमती मनु मानिआ ॥ सतिगुरु मिलिआ ता हरि पाइआ बिनु हरि नावै मुकति न होई ॥ नानक कामणि कंतै रावे मनि मानिऐ सुखु होई ॥१॥ {पन्ना 769-770}
अर्थ: हे भाई! (युग चाहे कोई भी हो) गुरू (की शरण पड़े) बिना पति प्रभू का मिलाप नहीं होता, जीव-स्त्री चाहे चारों युगों में भटकती फिरे। उस प्रभू-पति का हुकम अटल है (कि गुरू के द्वारा ही उसका मिलाप प्राप्त होता है)। उसके बिना कोई और उसकी बराबरी का नहीं (जो इस हुकम को बदलवा सके)। हे भाई! जिस प्रभू के बिना उस जैसा और कोई नहीं। वह प्रभू स्वयं ही सदा कायम रहने वाला है। गुरू के सन्मुख रहने वाली जीव-स्त्री उस एक के साथ गहरी सांझ बनाती है। जब गुरू की मति पर चल के जीव-स्त्री का मन (परमात्म की याद में) रीझ जाता है, तब जीव-स्त्री का प्रभू-पति से मिलाप हो जाता है।
हे भाई! जब गुरू मिलता है तब ही प्रभू की प्राप्ति होती है (गुरू ही) प्रभू का नाम जीव-स्त्री के हृदय में बसाता है, और परमात्मा के नाम के बिना (माया के बँधनों से) खलासी नहीं होती। हे नानक! अगर मन प्रभू की याद में रीझ जाए, तो जीव-स्त्री प्रभू के मिलाप का आनंद भोगती है, उसके हृदय में आनंद पैदा हुआ रहता है।1।a



