सूही महला ४ ॥
हरि पहिलड़ी लाव परविरती करम द्रिड़ाइआ बलि राम जीउ ॥ बाणी ब्रहमा वेदु धरमु द्रिड़हु पाप तजाइआ बलि राम जीउ ॥ धरमु द्रिड़हु हरि नामु धिआवहु सिम्रिति नामु द्रिड़ाइआ ॥ सतिगुरु गुरु पूरा आराधहु सभि किलविख पाप गवाइआ ॥ सहज अनंदु होआ वडभागी मनि हरि हरि मीठा लाइआ ॥ जनु कहै नानकु लाव पहिली आर्मभु काजु रचाइआ ॥१॥ {पन्ना 773}
अर्थ: हे राम जी! मैं तुझसे सदके जाता हूँ। (तेरी मेहर से गुरू के सिख को) हरी-नाम जपने के आहर में व्यस्त होने का काम निश्चय करवाया है (हरी-नाम जपने की कर्म प्रवृति दृढ़ करवाई है)। यही है प्रभू-पति से (जीव-स्त्री के विवाह की) पहली सुंदर लांव। हे भाई! गुरू की बाणी ही (सिख के लिए) ब्रहमा के वेद हैं। इस बाणी की बरकति से (परमात्मा के नाम के सिमरन का) धर्म (अपने हृदय में) पक्का करो (नाम सिमरने से सारे) पाप दूर हो जाते हैं। हे भाई! परमात्मा का नाम सिमरते रहो, (मनुष्य के जीवन का यह) धर्म (अपने अंदर) पक्का कर लो। गुरू ने जो नाम-सिमरन की ताकीद की है, यही सिख के लिए स्मृतियों (का उपदेश) है। हे भाई! पूरे गुरू (के इस उपदेश को) हर वक्त याद रखो, सारे पाप विकार (इसकी बरकति से) दूर हो जाते हैं।
हे भाई! जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम प्यारा लगने लग जाता है, उस अति भाग्यशाली को आत्मिक अडोलता का सुख मिला रहता है। दास नानक कहता है– परमात्मा का नाम जपना प्रभू-पति के साथ जीव-स्त्री के विवाह की पहली लांव है। हरी के नाम सिमरन से ही (प्रभू-पति से जीव-स्त्री के) विवाह (का) आगाज़ (आरम्भ) होता है।1।



