बिलावलु महला ५ ॥
उदमु करत आनदु भइआ सिमरत सुख सारु ॥ जपि जपि नामु गोबिंद का पूरन बीचारु ॥१॥ चरन कमल गुर के जपत हरि जपि हउ जीवा ॥ पारब्रहमु आराधते मुखि अम्रितु पीवा ॥१॥ रहाउ ॥ जीअ जंत सभि सुखि बसे सभ कै मनि लोच ॥ परउपकारु नित चितवते नाही कछु पोच ॥२॥ धंनु सु थानु बसंत धंनु जह जपीऐ नामु ॥ कथा कीरतनु हरि अति घना सुख सहज बिस्रामु ॥३॥ मन ते कदे न वीसरै अनाथ को नाथ ॥ नानक प्रभ सरणागती जा कै सभु किछु हाथ ॥४॥२९॥५९॥ {पन्ना 815}
अर्थ: हे भाई! गुरू के सुंदर चरणों का ध्यान धर के, परमात्मा की आराधना करते हुए, परमात्मा का नाम जप-जप के, (ज्यों-ज्यों) मैं मुँह से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीता हूँ, (त्यों-त्यों) मुझे आत्मिक जीवन प्राप्त होता है।1। रहाउ।
हे भाई! (परमात्मा का नाम जपने का) उद्यम करते हुए (मन में) सरूर पैदा हो है, नाम सिमरते हुए सबसे श्रेष्ठ सुख मिलता है। परमात्मा का नाम बारंबार जप-जप के सब गुणों से भरपूर परमात्मा के गुणों का विचार (मन में टिका रहता है)।1।
हे भाई! (परमात्मा की आराधना करते हुए) सारे जीव-जंतु आत्मिक आनंद में लीन रहते हैं, (जपने वाले) सबके मनों में (सिमरने की) तमन्ना पैदा हुई रहती है। (जो-जो मनुष्य नाम जपते हैं, वे) सदा दूसरों की भलाई करने का काम सोचते रहते हैं, कोई पाप-विकार उन पर अपना असर नहीं डाल सकता।2।
हे भाई! जिस जगह पर परमात्मा का नाम जपा जाता है, वह जगह भाग्यशाली हो जाती है, वहाँ बसने वाले भी भाग्यशाली बन जाते हैं (क्योंकि जिस जगह) परमात्मा की कथा-वार्ता, प्रभू की सिफत-सालाह बहुत होती रहे, वह जगह आत्मिक आनंद का, आत्मिक अडोलता का ठिकाना (श्रोत) बन जाता है।3।
(इस वास्ते) हे नानक! (कह- हे भाई!) वह अनाथों का नाथ प्रभू कभी मन से भूलना नहीं चाहिए, उस प्रभू की शरण सदा पड़े रहना चाहिए, जिसके हाथ में सब कुछ है।4।29।59।



