सलोकु मः ३ ॥
विणु नावै सभि भरमदे नित जगि तोटा सैसारि ॥ मनमुखि करम कमावणे हउमै अंधु गुबारु ॥ गुरमुखि अम्रितु पीवणा नानक सबदु वीचारि ॥१॥ मः ३ ॥ सहजे जागै सहजे सोवै ॥ गुरमुखि अनदिनु उसतति होवै ॥ मनमुख भरमै सहसा होवै ॥ अंतरि चिंता नीद न सोवै ॥ गिआनी जागहि सवहि सुभाइ ॥ नानक नामि रतिआ बलि जाउ ॥२॥ पउड़ी ॥ से हरि नामु धिआवहि जो हरि रतिआ ॥ हरि इकु धिआवहि इकु इको हरि सतिआ ॥ हरि इको वरतै इकु इको उतपतिआ ॥ जो हरि नामु धिआवहि तिन डरु सटि घतिआ ॥ गुरमती देवै आपि गुरमुखि हरि जपिआ ॥९॥ {पन्ना 646}
अर्थ: नाम के बिना सारे लोग भटकते फिरते हैं; उनको संसार में सदा घाटा ही घाटा है; हे नानक! मनमुख तो अहंकार के आसरे ऐसे कर्म कमाते हैं जो घोर अंधकार पैदा करते हैं। पर सतिगुरू के सन्मुख जीव शबद को विचार के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीते हैं।1।
अर्थ: जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख होता है वह आत्मिक अडोलता में ही जागता है और आत्मिक अडोलता में ही सोता है (भाव, जागते हुए हरी में लीन और सोते हुए भी हरी में लीन रहता है) उसे हर रोज (भाव, हर वक्त) हरी की उस्तति (का ही आहर होता) है।
मनमुख भटकता है, क्योंकि उसे सदा तौखला रहता है; मन में चिंता होने के कारण वह (सुख की) नींद नहीं सोता।
प्रभू के साथ गहरी सांझ रखने वाले बँदे प्रभू के प्यार में ही जागते सोते हैं (भाव, जागते-सोते हुए एक-रस रहते हैं)। हे नानक! मैं नाम में रंगे हुओं से सदके हूँ।2।
जो मनुष्य हरी में रंगे हुए हैं, वे उसका नाम सिमरते हैं; उस एक हरी को ध्याते हैं, जो सदा कायम रहने वाला है जो एक खुद हर जगह में व्यापक है और जिस एक ने ही (सारी सृष्टि) पैदा की है। जो मनुष्य नाम सिमरते हैं, उन्होंने सारा डर दूर कर दिया है। पर, वही गुरमुख नाम सिमरता है जिसे प्रभू खुद गुरू की मति के द्वारा ये दाति देता है।9।



