Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar – 30-9-24

सूही महला १ काफी घरु १० ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

माणस जनमु दुल्मभु गुरमुखि पाइआ ॥ मनु तनु होइ चुल्मभु जे सतिगुर भाइआ ॥१॥ चलै जनमु सवारि वखरु सचु लै ॥ पति पाए दरबारि सतिगुर सबदि भै ॥१॥ रहाउ ॥ मनि तनि सचु सलाहि साचे मनि भाइआ ॥ लालि रता मनु मानिआ गुरु पूरा पाइआ ॥२॥ हउ जीवा गुण सारि अंतरि तू वसै ॥ तूं वसहि मन माहि सहजे रसि रसै ॥३॥ मूरख मन समझाइ आखउ केतड़ा ॥ गुरमुखि हरि गुण गाइ रंगि रंगेतड़ा ॥४॥ नित नित रिदै समालि प्रीतमु आपणा ॥ जे चलहि गुण नालि नाही दुखु संतापणा ॥५॥ मनमुख भरमि भुलाणा ना तिसु रंगु है ॥ मरसी होइ विडाणा मनि तनि भंगु है ॥६॥ गुर की कार कमाइ लाहा घरि आणिआ ॥ गुरबाणी निरबाणु सबदि पछाणिआ ॥७॥ इक नानक की अरदासि जे तुधु भावसी ॥ मै दीजै नाम निवासु हरि गुण गावसी ॥८॥१॥३॥ {पन्ना 751-752}

नोट: ये अष्टपदी सूही और काफी दानों मिश्रित रागनियों में गाई जानी हैं। काफी एक रागिनी का नाम है।

अर्थ: जो मनुष्य सतिगुरू के शबद के द्वारा (परमात्मा के) डर-अदब में (रह के) सदा-स्थिर प्रभू के नाम के सौदे का व्यापार करता है और अपना जीवन सोहाना बना के (यहाँ से) जाता है वह (परमात्मा की) दरगाह में इज्जत हासिल करता है।1। रहाउ।

(चौरासी लाख जूनियों में से) मानस जन्म बड़ी मुश्किल से मिलता है, पर इसकी कद्र वही मनुष्य जानता है जो गुरू की शरण पड़े। यदि सतिगुरू को ठीक लगे (अर्थात अगर सतिगुरू की कृपा हो जाए) तो (शरण आए उस मनुष्य का) मन और शरीर (प्रभू के प्रेम-रंग से) गाढ़ा लाल हो जाता है (नाम की बरकति से उसको लाली चढ़ी रहती है)।1।

जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है वह अपने मन व शरीर के द्वारा सदा-स्थिर परमात्मा की सिफत सालाह करके सदा स्थिर प्रभू के मन में प्यारा लगने लग पड़ता है। प्रभू नाम की लाली में मस्त हुआ उसका मन उस लाली में भीग जाता है (उसके बिना रह नहीं सकता)।2।

हे प्रभू! यदि तू मेरे मन में बस जाए, तो मेरा मन अडोल अवस्था में टिक के तेरे नाम के स्वाद में भीग जाए, तेरे गुण याद कर कर के मेरे अंदर आत्मिक जीवन मौल पड़े, मेरे अंदर ‘तू ही तू’ की धुन लग जाए।3।

हे मेरे मूर्ख मन! मैं तुझे कितना समझा-समझा के बताऊँ कि गुरू की शरण पड़ के परमात्मा की सिफत सालाह कर, परमात्मा के नाम-रंग में रंगा जा (और इस तरह अपना जन्म-मरण सुंदर बना ले)।4।

हे भाई! अपने प्रीतम प्रभू को सदा अपने दिल में संभाल के रख। अगर तू (प्रभू की भक्ति वाले अच्छे) गुण ले के (जीवन-यात्रा में) चले तो कोई दुख-कलेश तुझे नहीं छू सकेगा।5।

अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का मन भटकन में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ा रहता है, उसको परमात्मा के नाम की लाली नहीं चढ़ती। वह बेगाना (बिना पति वाला निखसमा) हो के आत्मिक मौत सहेड़ता है, उसके मन में उसके शरीर में (परमात्मा से) विछोड़ा बना रहता है।6।

जिस मनुष्य ने गुरू द्वारा बताया हुआ काम (भक्ति) करके (भक्ति का) लाभ अपने हृदय-गृह में ले लिया उसने गुरू की बाणी की बरकति से गुरू के शबद में जुड़ के वासना-रहित परमात्मा के साथ गहरी सांझ बना ली।7।

हे प्रभू! मेरी नानक की अरदास भी यही है कि अगर तुझे ये बात पसंद आ जाए तो मेरे हृदय में भी अपने नाम का निवास कर दे ता कि मैं तेरे गुण गाता रहूँ।8।1।3।

नोट: ये अष्टपदी ‘घरु १०’ की है। कुल जोड़ 3 है।

About the Author

Leave a Reply

You may also like these