Amrit Vele Ka Hukamnama (HINDI) Gurdwara Sri Guru Singh Sabha C Block Hari Nagar – 28-9-24

सलोक मः ३ ॥
अंदरि कपटु सदा दुखु है मनमुख धिआनु न लागै ॥ दुख विचि कार कमावणी दुखु वरतै दुखु आगै ॥ करमी सतिगुरु भेटीऐ ता सचि नामि लिव लागै ॥ नानक सहजे सुखु होइ अंदरहु भ्रमु भउ भागै ॥१॥
मः ३ ॥
गुरमुखि सदा हरि रंगु है हरि का नाउ मनि भाइआ ॥ गुरमुखि वेखणु बोलणा नामु जपत सुखु पाइआ ॥ नानक गुरमुखि गिआनु प्रगासिआ तिमर अगिआनु अंधेरु चुकाइआ ॥२॥

मः ३ ॥
मनमुख मैले मरहि गवार ॥ गुरमुखि निरमल हरि राखिआ उर धारि ॥ भनति नानकु सुणहु जन भाई ॥ सतिगुरु सेविहु हउमै मलु जाई ॥ अंदरि संसा दूखु विआपे सिरि धंधा नित मार ॥ दूजै भाइ सूते कबहु न जागहि माइआ मोह पिआर ॥ नामु न चेतहि सबदु न वीचारहि इहु मनमुख का बीचार ॥ हरि नामु न भाइआ बिरथा जनमु गवाइआ नानक जमु मारि करे खुआर ॥३॥

पउड़ी ॥
जिस नो हरि भगति सचु बखसीअनु सो सचा साहु ॥ तिस की मुहताजी लोकु कढदा होरतु हटि न वथु न वेसाहु ॥ भगत जना कउ सनमुखु होवै सु हरि रासि लए वेमुख भसु पाहु ॥ हरि के नाम के वापारी हरि भगत हहि जमु जागाती तिना नेड़ि न जाहु ॥ जन नानकि हरि नाम धनु लदिआ सदा वेपरवाहु ॥७॥ {पन्ना 851}

अर्थ: हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के मन में खोट टिका रहता है (इस वास्ते उसको) सदा (आत्मिक) कलेश रहता है, उसकी सुरति (परमात्मा में) नहीं जुड़ती। उस मनुष्य की सारी किरत-कार दुख-कलेश में ही होती है (उसको हर वक्त) कलेश ही बना रहता है, परलोक में भी उसके वास्ते कलेश ही है।

हे नानक! (जब परमात्मा की) मेहर से (मनुष्य को) गुरू मिलता है तब सदा-स्थिर हरी-नाम में उसकी लगन लग जाती है, आत्मिक अडोलता में (टिकने के कारण उसको आत्मिक) आनंद मिला रहता है और उसके मन में से भटकना दूर हो जाती है सहम दूर हो जाता है।1।

हे भाई! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है (उसके अंदर) सदा परमात्मा के नाम की रंगत चढ़ी रहती है, उसको परमात्मा का नाम (अपने) मन में प्यारा लगता है। (वह मनुष्य हर जगह परमात्मा को ही) देखता है (सदा परमात्मा का) नाम ही उचारता है, नाम जपते हुए उसको आत्मिक आनंद मिला रहता है।

हे नानक! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के अंदर आत्मिक जीवन की सूझ का प्रकाश हो जाता है (जिसकी बरकति से उसके अंदर से) सही जीवन की सूझ की वजह से बेसमझी का घोर अंधेरा समाप्त हो जाता है।2।

हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य विकारी मन वाले रहते हैं और आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य पवित्र जीवन वाले होते हैं (क्योंकि उन्होंने) परमात्मा (के नाम) को अपने हृदय में टिका के रखा होता है। नानक कहता है- हे भाई जनो! सुनो, गुरू के बताए हुए राह पर चला करो (इस तरह अंदर से) अहंकार की मैल दूर हो जाती है।

पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों के अंदर सहम और कलेश जोर डाले रखता है, उनके सिर पर (ऐसा) कज़िया खपाना बना ही रहता है (सिर पर धंधो का खपखाना, उलझनें बनी रहती हैं)। माया के प्यार में (फस के वह सही जीवन की ओर से) सोए रहते हैं, कभी होश नहीं करते। माया का मोह माया का प्यार (इतना प्रबल होता है कि) वे कभी हरी-नाम नहीं सिमरते, सिफत-सालाह की बाणी को नहीं विचारते- बस! मन के मुरीद लोगों के सोचने का ढंग ही ये बन जाता है। उनको परमात्मा का नाम अच्छा नहीं लगता, वे अपनी जिंदगी व्यर्थ गवा लेते हैं, आत्मिक मौत उनके सही जीवन को समाप्त करके उनको तड़पाती रहती है।3।

हे भाई! परमात्मा की भक्ति सदा कायम रहने वाला धन है। जिस मनुष्य को परमात्मा ने भक्ति (की दाति) दी, वह सदा के लिए शाहूकार बन गया। सारा जगत उसके दर का अर्थिया बनता है (क्योंकि) किसी और हाट में ना ये सौदा मिलता है ना ही इसका वणज होता है। जो मनुष्य भगत जनों की तरफ़ अपना मुँह रखता है, उसको ये सरमाया ये पूँजी मिल जाती है, पर भगत-जनों से मुँह मोड़ने वाले के सिर पर राख ही पड़ती है।

हे भाई! परमात्मा के भक्त परमात्मा के नाम का वणज करते हैं, जम मसूलिया उनके नजदीक नहीं फटकता। दास नानक ने (भी) परमात्मा के नाम-धन का सौदा लादा है (इस वास्ते दुनिया के धन की ओर से) बेमुहताज रहता है।7।

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